5. क़ुरआन में सम्बोधन शैलियों की भिन्नता के कारण जिस समय हम आयतों के पहले और दूसरे समूह को ध्यान से देखते हैं तो परिणाम यह निकलता है कि आयतों का स्वर एक दूसरे से विभिन्न है आयतों का पहला समूह उन लोगों के बारे में है कि जिन्होंने अभी तक इस्लाम स्वीकार नहीं किया है, इसी कारण ईश्वर उन लोगों को इस्लाम की वास्तविकता से अवगत कराता है और अपने अनुकरण के लाभों को बयान करता है और जब अपने पैग़म्बर को जो ईश्वर की कृपा व दया के सूचक हैं, कुछ लोगों के इस्लाम स्वीकार न करने और ईश्वर के अनुकरण से मुंह मोड़ने के कारण चिंतित देखता है कि जिसके परिणाम में यह लोग नर्क के रास्ते को अपने लिए चुनते हैं, तो ऐसे अवसर पर ईश्वर अपने रसूल को चिंतित देखकर उनकी सहानुभूति करता है कि ऐ मेरे प्रियतम उन लोगों के विश्वास न लाने से क्यों शोकाकुल होते हो और अपनी जान को ख़तरे में डालते हो, हमने इस्लाम को इसलिए अवतीर्ण किया है ताकि लोग अपनी इच्छा और अपने अधिकार से उसे स्वीकार करें अन्यथा हम चाहते तो सभी लोगों को मार्ग दर्शन करा देते और उसके करने में हम सामर्थ्य भी हैं जैसा कि ईश्वर का पवित्र कथन हैःअगर आपका प्रतिपालक व स्वामी चाहता तो जितने लोग धरती पर हैं, सबके सब इस्लाम पर विश्वास ले आते, तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो ताकि सब के सब आस्तिक व विश्वासी हो जाएं। ईश्वर का ईशदूतों व संदेशदाताओं को भेजने का लक्ष्य यही है कि लोग सत्यता पहचानते हुए अपने लिए सुख, शांति और आनन्द का मार्ग चुनें और अपनी इच्छा से सत्य धर्म को स्वीकार करें न यह कि ईश्वर उनको स्वीकार करने पर मजबूर करे, वह विश्वास जो विवशता पूर्वक और बल प्रयोग से प्राप्त हो उसका कोई मूल्य और महत्व नहीं है और आप का कार्य केवल हमारे संदेश को पहुँचाना था अतः आप उन अनेकेश्वरवादियों के विश्वास न लाने के कारण चिंतित न हों। क्या आप सोचते हैं कि आपने अपनी नुबूव्वत (ईश-दौत्य) के कर्तव्यों का पालन नहीं किया? आपके ईश-दौत्य का कर्तव्य यह नहीं है कि जनता को बल प्रयोग और विवशता पूर्वक मुसलमान करें, क्यों कि हमने आपको नास्तिकों के लिए चयन नहीं किया है कि बल प्रयोग द्वारा उनको मुसलमान करें। आयतों के पहले समूह के मुक़ाबले में आयतों का दूसरा समूह उन लोगों के बारे में है कि जिन्होंने जानकारी के साथ अपनी इच्छा से इस्लाम को स्वीकार किया है। इन आयतों में उन लोगों को संदेश दिया जा रहा है कि इस्लामी नियमों का पालन करें और उस पैग़म्बर का अनुकरण करें जिस पर विश्वास रखते हैं कि यह पैग़म्बर और उसके सभी नियम ईश्वर की ओर से हैं और उस पैग़म्बर के मत के सामने अपने को झुका दें और लोग (जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया है) इस्लामी ईशदूत रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम के आदेश पर विकल्पों के निर्वाचन का अधिकार भी नहीं रखते हैं।इस्लाम स्वीकार करने से पहले मनुष्य को निर्वाचन का अधिकार है परन्तु इस्लाम को स्वीकार करने के बाद समस्त धार्मिक नियमों को मानना पड़ेगा इस आधार पर वह लोग जो ईश्वर के कुछ नियम पर विश्वास रखते हैं ईश्वर उनकी आलोचना करता है।निःसंदेह जो लोग ईश्वर और उसके ईशदूतों का इंकार करते हैं ईश्वर और उसके ईशदूतों में भेदभाव करते हैं और कहते हैं कि हम कुछ पैग़म्बरों पर विश्वास लाए हैं और कुछ का इंकार करते हैं और चाहते हैं कि इस नास्तिकता और विश्वास के मध्य एक दूसरा मार्ग निकालें यही लोग वस्तुतः अनीश्वरवादी व नास्तिक हैं। कुछ नियमों को स्वीकार करना और कुछ दूसरे नियमों स्वीकार न करना इसी तरह कुछ आदेशों को स्वीकार करना और दूसरे आदेशों से इंकार करना मानो अस्ल धर्म से इंकार करने समान है। क्योंकि धर्म को स्वीकार करने का आधार ईश्वर के आदेशों को मानना है तो ईश्वरीय आदेश के अनुसार अमल किया जाए और ईश्वर के समस्त नियम और क़ानून स्वीकार करने के लिए हैं। यहां तक कि अगर धर्म स्वीकार करने का आधार मसालेह अर्थात हित व अच्छाई और मफासिद अर्थात उपद्रव हो कि जिनको ईश्वर जानता है और अपने नियमों में उनकी ओर ध्यान देता है और इसमें कोई शंका नहीं के ईश्वर समस्त मसालेह अर्थात हित व अच्छाई और मफासिद अर्थात उपद्रव को जानता है अतः फिर क्यों कुछ नियमों को स्वीकार किया जाए और कुछ को छोड़ दिया जाए? तो परिणाम यह निकला कि वही व्यक्ति ईश्वर पर विश्वास रखता है जो पैग़म्बर पर भी विश्वास रखता हो और उनके उत्तराधिकारियों के निर्णय और उनके आदेश को भी स्वीकार करे और मन से भी इस पर संतुष्ट रहे और ज़रा भी कुरूद्धता और अप्रसन्नता का आभास न करे।तो ऐ रसूल, तुम्हारे प्रतिपालक व स्वामी की सौगंध, यह लोग सच्चे आस्तिक न होंगे जब तक अपने आपसी झगड़ों में तुमको अपना मध्यस्थ न बनाएं फिर यही नहीं बल्कि जो कुछ तुम निर्णय लो उस से किसी तरह दुखी भी न हों बल्कि प्रसन्नता व हर्ष से उसको मान लें। वास्तव में मोमिन, रसूले इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम के निर्णय को हृदय से स्वीकार करता है और कुरूद्धता व अप्रसन्नता का आभास नहीं करता है। इसका कारण यह है कि उसको पूरा विश्वास है कि यह रसूल, ईश्वर का भेजा हुआ है, उनका आदेश ईश्वर का आदेश है और यह रसूल अपनी ओर से कुछ नहीं कहता है।ऐ रसूल, हमने तुम पर सत्यता पर आधारित किताब इस लिए अवतीर्ण की है कि जिस तरह ईश्वर ने तुम्हें मार्ग बताया है तुम जनता के मध्य मध्यस्थ बन कर निर्णय लो। अगर कोई इस्लाम को स्वीकार करने के बाद कहे कि में इस्लामी नियमों के पालन करने के बारे में स्वतंत्र हूँ चाहूँ पालन करूँ या न करूँ। तो यह उस शासन की तरह है कि जो लोकतंत्र और स्वतंत्र है और लोग अपनी इच्छा से इस शासन के चुनाव में सम्मिलित होते हैं और अपने वोटों द्वारा प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मिम्बर आफ पारलिमेंट को चयन करते हैं परन्तु जब यही शासन क़ानून बनाता है तो उसका पालन करने से इंकार कर देते हैं।और जब यह शासन कर (टैक्स) लगाता है तो क्या किसी को कहने का अधिकार है कि मैं नहीं दूँगा, हम शासन के निर्वाचन और वोट देने में स्वतंत्र थे अतः अब भी हम स्वतंत्र हैं कि क़ानून का पालन करें या न करें। इन बातों को कोई भी बुद्धिमान स्वीकार नहीं कर सकता है।जी हाँ इस्लाम को स्वीकार करने में किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता क्यों कि इस्लाम हृदय में विश्वास का नाम है परन्तु अगर किसी ने इस्लाम स्वीकार कर लिया है तो जिस समय उससे कहा जाएगा कि नमाज़ पढ़ो और अगर कोई कहे कि में नमाज़ नहीं पढ़ूंगा या अगर उससे कहा जाए धर्मदाय दो परन्तु वह धर्मदाय देने से इंकार करे, तो कोई भी मनुष्य इसको स्वीकार नहीं कर सकता। अगर किसी ने इस्लाम स्वीकार कर लिया तो उसके समस्त नियमों को भी स्वीकार करना पड़ेगा यह नहीं हो सकता कि इस्लाम तो स्वीकार करे परन्तु उसके नियमों को स्वीकार न करे और अपनी इच्छा अनुसार कार्य अन्जाम दे। कोई भी शासन इस बात को मानने को तय्यार नहीं हो सकता है कि आदमी उसको वोट दे परन्तु क्रियात्मक मैदान में उस शासन के नियमों को स्वीकार न करे, सामाजिक जीवन में मौलिक और सबसे मूल कर्तव्य व उत्तरदायित्व, प्रतिज्ञा व वचन पर निष्ठावान होना है और इसके अतिरिक्त सामाजिक जीवन की स्थापना सम्भव नहीं है। अतः अगर कोई यह कहे कि मैं इस्लाम को स्वीकार करता हूँ और पैगम्बर पर विश्वास रखता हूँ परन्तु इस्लाम के नियमों और आदेशों का पालन नहीं करता हूँ और उसके शासन अधिकार और स्वामित्व को स्वीकार नहीं करता तो ऐसे इस्लाम का कोई लाभ नहीं हैं क्यों कि इस्लाम और पैगम्बर को स्वीकार करना और उनके अनुकरण व अनुसरण न करने में ज़ाहिरी टकराव निहित है। हमारी
5 नवंबर 2012 - 20:30
समाचार कोड: 362746
जिस समय हम आयतों के पहले और दूसरे समूह को ध्यान से देखते हैं तो परिणाम यह निकलता है कि आयतों का स्वर एक दूसरे से विभिन्न है आयतों का पहला समूह उन लोगों के बारे में है कि जिन्होंने अभी तक इस्लाम स्वीकार नहीं किया है..