पिछले अध्याय में हमने तशय्यो के आरम्भ और शिया समुदाय के इतिहास के बारे में सही दृष्टिकोण विस्तार के साथ बयान किया है जिससे उत्तम रूप से स्पष्ट हो जाता है कि तशय्यो का इतिहास इस्लाम के इतिहास से जुड़ा हुआ है और स्वंय इस्लाम के संस्थापक ने ही तशय्यो की नींव रखी है, हमने इस बात की ओर भी इशारा किया था कि शिया समुदाय के आरम्भ के बारे में कुछ लेखकों और विचारकों के दृष्टिकोण हमसे भिन्न हैं और हमने वचन दिया था कि एक अलग अध्याय में इन असत्य और ग़लत दृष्टिकोणों की समीक्षा की जाएगी अतः इस अध्याय में उन्हीं दृष्टिकोणों का विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है। इन दृष्टिकोणों को उल्लेख करने या उन पर आलोचनात्मक चर्चा से पहले यह स्पष्ट कर देना उचित है कि पिछले अध्याय की चर्चा और सही दृष्टिकोण के समर्थन में प्रस्तुत किए जाने वाले प्रमाणों के बाद दूसरे असत्य दृष्टिकोणों के बारे में चर्चा की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है परन्तु चूँकि इस किताब का उद्देश्य सभी चर्चाओं को पूर्ण रूप से स्पष्ट करना और उन्हें स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना है अतः उचित होगा कि दूसरे दृष्टिकोणों पर भी अनुसंधानिक दृष्टि डाल ली जाए।1. अब्दुल्लाह इब्ने सबा की परिकल्पना कुछ लेखकों के अनुसार शिया समुदाय उस्मान की ख़िलाफ़त के अंतिम दिनों में आस्तित्व में आया और शिया समुदाय का निर्माता अब्दुल्लाह इब्ने सबा नामक व्यक्ति है, इन लेखकों के अनुसार अब्दुल्लाह इब्ने सबा एक यहूदी था जो उसमान की ख़िलाफ़त के युग में इस्लाम का लबादा ओढ़ कर दिखावे में मुसलमान हो गया परन्तु वास्तव में उसका मौलिक उद्देश्य इस्लामी मूल तत्वों में परिवर्तन करना था अतः उसने हज़रत अली (अ.) की ख़िलाफ़ते बिला फ़स्ल का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया उसके साथ साथ इस्मत अर्थात निर्दोषिता व सतीत्व को इमामत की अनिवार्य शर्त बताया। इस प्रकार इमामत जो कि एक सामान्य व राजनीतिक आवश्यकता थी उसमें पवित्रता का रंग भर दिया। अब्दुल्लाह इब्ने सबा ने ही पिछले खुलफ़ा की ख़िलाफ़त के अधिहरण व अवैध होने की घोषणा करके लोगों को वर्तमान युग के ख़लीफ़ा के विरूद्ध भड़काया और अनंततः विद्रोहियों के हाथों तीसरे ख़लीफ़ा क़त्ल हो गए इस प्रकार उन लोगों के ख़्याल में शिया समुदाय अब्दुल्लाह इब्ने सबा का आविष्कार है और उसका क़ुरआन व सुन्नत, अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) या पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के बड़े अस्हाब की नैतिकता और व्यवहार व चरित्र से कोई सम्बंध नहीं है। यह दृष्टिकोण अनेक व विभिन्न कारणों से अस्वीकार्य है और विभिन्न दिशाओं से टिप्पणी के योग्य है ।1. इस दृष्टिकोण का परिणाम यह है कि हम इस्लामी ख़िलाफ़त को समाज की वास्तविकताओं और घटनाओं एंव परिस्थितियों से अनभिज्ञ स्वीकार करें या यह स्वीकार करें कि उन्हें इस्लाम व मुसलमानों की कोई चिंता ही नहीं थी या फिर जबरन यह मानना पड़ेगा कि उनमें इतनी क्षमता ही नहीं थी कि वह षड़यंत्रों का मुक़ाबिला कर सकें, अतः उन्होंने कुछ नहीं किया। हालांकि इतिहास साक्षी है कि ख़लीफ़ा और सरकारी कर्मचारी, विरोधियों के साथ बहुत कठोरता से व्यवहार करते थे चाहे वह विरोधी महान अस्हाब ही क्यों न हों। अतः जनाब अबूज़र ग़फ़्फ़ारी को रबज़ह निर्वासित किया गया। जनाब अम्मार यासिर को कोड़े लगाए गए, अत्याधिक शारीरिक यातनाएं पहुँचाई गयीं, ऐसी परिस्थितियों में यह कैसे माना जा सकता है कि मुसलमानों के बीच इतना बड़ा षड़यंत्र परवान चढ़ता रहा और सत्ता पर विराजमान शासक ख़ामोश तमाशाई बने रहे? ख़िलाफ़त की ओर से उन लोगों के विरूद्ध किसी भी प्रतिक्रिया का प्रकट न होना क्या इस दृष्टिकोण के असत्य होने की पुष्टि नहीं करता? क्या यह इस परिकल्पना के असत्य होने का प्रमाण नहीं है?2. उल्लिखित परिकल्पना या दृष्टिकोण न केवल यह कि ख़िलाफ़त और ख़लीफ़ा पर प्रश्न चिन्ह लगाता है बल्कि पूरे मुस्लिम वर्ग और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के समस्त बड़े अस्हाब पर उंगली उठाने का अवसर प्रदान करता है। क्या वास्तव में यह स्वीकार किया जा सकता है कि पूरा मुस्लिम वर्ग एक यहूदी के षड़यंत्र से अनभिज्ञ रहा या षड़यंत्र के प्रति अचेतना बरतता रहा और अनंततः षड़यंत्र का शिकार हो कर एक यहूदी के हाथों का खिलौना बन गया? विशेष कर अब्दुल्लाह इब्ने सबा की कहानी में अबूज़र, अम्मारे यासिर, मुहम्मद इब्ने हुज़ैफ़ा, मुहम्मद इब्ने अबू बक्र, सअसआ इब्ने सोहान और मालिके अशतर जैसे महान व्यक्तियों का नाम देख कर क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि यह महोदय भी उसके प्रलोभन व उपद्रव का शिकार हुए और उस्मान की हत्या तथा जमल के युद्ध जैसी घटनाओं को हवा देने वाले यही लोग थे !!!3. जिन विशेषताओं के साथ अब्दुल्लाह इब्ने सबा का उल्लेख होता है अगर वास्तव में ऐसा कोई व्यक्ति मौजूद होता तो अलवियों के विरोधियों के कथनों या लेखों में उसका कोई वर्णन क्यों नहीं मिलता हालांकि विरोधियों ने अलवियों को बदनाम करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी, अगर ऐसा व्यक्ति वास्तव में मौजूद होता या यह कहानी वास्तविकता पर आधारित होती तो निसंदेह सबसे अधिक मुआविया और उसके समर्थक व सहयोगी और उसके पिठ्ठू अलवियों और शियों को बदनाम करने के लिए जगह जगह इसी कहानी का प्रचार करते दिखाई देते, परन्तु किसी इतिहासिक स्रोत में ऐसा कोई इशारा भी नहीं मिलता है।4. प्रायः किसी भी धर्म के मानने वाले उस धर्म के संस्थापक या उसका प्रचार करने वाले महत्वपूर्ण विद्वानों व बुद्धिजीवियों का उल्लेख आदर व सम्मान से करते हैं और ऐसे लोगों को उस धर्म के अनुगामी सदैव अच्छे शब्दों से याद करते हैं जब कि शिया समुदाय के महत्वपूर्ण विद्धानों व लेखकों ने जहाँ कहीं भी अब्दुल्लाह इब्ने सबा का उल्लेख किया है वहाँ या तो सिरे से अब्दुल्लाह इब्ने सबा के आस्तित्व का ही इंकार किया है या बुरे शब्दों और धिक्कार के साथ उसका उल्लेख किया है।5. इतिहासिक दृष्टि से भी अब्दुल्लाह इब्ने सबा की कहानी का केवल एक ही स्रोत है और वह है तारीख़े तबरी यद्धपि इब्ने असीर, अबुल फ़िदा और इब्ने कसीर जैसे इतिहासकारों ने भी उसका उल्लेख किया है परन्तु इन सबका स्रोत तारीख़े तबरी ही है और तबरी ने भी इस कहानी को सैफ़ इब्ने उमर तमीमी द्वारा नक़्ल किया है जो इल्मे रेजाल के उल्मा के निकट हदीस गढ़ने का आरोपी है। उसने इस्लामी इतिहास के बारे में दो किताबें लिखीं हैं जिनमें अनगिनत निराधार और काल्पनिक बातें लिखीं हैं। अब्दुल्लाह इब्ने सबा की कहानी भी उन्हीं निराधार और काल्पनिक लेखों का एक भाग है।6. शिया हदीसों और मिलल व नहेल की किताबों में अब्दुल्लाह इब्ने सबा को ग़ाली और हज़रत अली (अ.) के ईश्वरत्व का विश्वासी कहा गया है उन्हीं किताबों में यह भी लिखा है कि हज़रत अली (अ.) उसके साथ बहुत कठोरता से पेश आए और आपने पहले उसके निर्वासन फिर क़त्ल का आदेश प्रसारित किया उसी के नाम की समानता के कारण ग़ालियों का एक समुदाय” सबीयह“ के नाम से भी जाना जाता है। स्पष्ट रूप से इन बातों का तबरी के द्वारा लिखी गई अब्दुल्लाह इब्ने सबा की कहानी से कोई सम्बंध नहीं है।सारांश यह हुआ कि अब्दुल्लाह इब्ने सबा द्वारा शिया समुदाय की उत्पत्ति का मुद्दा न इतिहासिक दृष्टि से सिद्ध है और न ही उसका कोई विश्वासपात्र स्रोत है। इसी के साथ यह दृष्टिकोण
20 सितंबर 2012 - 20:30
समाचार कोड: 349893
पिछले अध्याय में हमने तशय्यो के आरम्भ और शिया समुदाय के इतिहास के बारे में सही दृष्टिकोण विस्तार के साथ बयान किया है जिससे उत्तम रूप से स्पष्ट हो जाता है कि तशय्यो का इतिहास इस्लाम के इतिहास से जुड़ा हुआ है और स्वंय इस्लाम के संस्थापक ने ही तशय्यो की नींव रखी है, हमने इस बात की ओर भी इशारा किया था कि शिया समुदाय के आरम्भ के बारे में कुछ लेखकों और विचारकों के दृष्टिकोण हमसे भिन्न हैं और हमने वचन दिया था कि एक अलग अध्याय में इन असत्य और ग़लत दृष्टिकोणों की समीक्षा की जाएगी अतः इस अध्याय में उन्हीं दृष्टिकोणों का विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है।