12 सितंबर 2012 - 19:30

अमेरिकी सरकार ने अपना दामन छुड़ाने की कोशिश की है, लेकिन क्या किसी को यक़ीन आ सकता है कि पचास लाख डॉलर की लागत से बनने वाली फिल्म की तैयारी के चरणों और पागल पादरी के लगातार इस्लाम दुश्मन षड़यंत्र व्हाइट हाउस के अधिकारियों की सूचना और स्वीकृति के बिना अंजाम पाते रहे हैं?!

अमेरिकी सरकार ने अपना दामन छुड़ाने की कोशिश की है, लेकिन क्या किसी को यक़ीन आ सकता है कि पचास लाख डॉलर की लागत से बनने वाली फिल्म की तैयारी के चरणों और पागल पादरी के लगातार इस्लाम दुश्मन षड़यंत्र व्हाइट हाउस के अधिकारियों की सूचना और स्वीकृति के बिना अंजाम पाते रहे हैं?!अहलेबैत (अ) समाचार एजेंसी अबना की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में रसूलुल्लाह (स.) और इस्लाम धर्म के अपमान और गस्ताखी पर आधारित शर्मनाक फिल्म की तैयारी पर विश्व अहलेबैत (अ) परिषद ने निंदनीय बयान में इस सांस्कृतिक अपराध और दरिंदगी की निंदा की।इस बयान में जोर देकर कहा गया है कि नबियों और धर्मों की सम्मानित हस्तियों का अपमान एक घोर पाप है जो किसी भी धर्म के निकट स्वीकार्य योग्य नहीं है।बयान में कहा गया है कि "इससे पहले हालांकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही व सल्लम के अपमान का मूल कारण इस्लाम और कुरान की नीति और इलाही शिक्षा की सही पहचान न होना था लेकिन यह हरकत जैसा कि इस फिल्म के निदेशक ने अमेरिकी और इजरायली सूत्रों को बताया है जानबूझ कर और राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अंजाम पाई है।इस बयान में अपमानजनक कदम के बारे में अमेरिका को दोषी ठहराया गया है और कहा गया है: "अमेरिकी सरकार अपने आप को इस अपमानजनक कारवाई से अलग करने की कोशिश कर रही है लेकिन इस पर किसको विश्वास हो सकता है कि ज़ायोनी शासन के पचास लाख डॉलर धन से बनने वाली इस फिल्म के विभिन्न चरणों और पागल पादरी की लगातार इस्लाम दुश्मन कारवाईयां, व्हाइट हाउस की मंजूरी या उनकी जानकारी के बिना अंजाम पाए होंगे!?विश्व अहलेबैत (अ) परिषद ने इस बयान में इस्लाम और पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही व सल्लम और इस्लाम के सभी प्रेमियों और दुनिया भर के सभी मुसलमानों से अपील की है कि वह विरोध प्रदर्शनों, बयानों आदि के माध्यम से इस निंदनीय कारवाई और इस फिल्म पर दुनिया भर में प्रतिबंध लगवाने के लिए प्रयास करें ताकि भविष्य में ऐसी शैतानी हरकतों का दोबारा अंजाम न दिया जाए।अमेरिकी ज़ायोनी अपमानजनक फिल्म पर विश्व अहलेबैत (अ) परिषद का निंदनीय बयान:بسم الله الرحمن الرحیمإنَّكَ لا تُسمِعُ المَوتَى وَلا تُسمِعُ الصُّمَّ الدُّعَاء إِذَا وَلَّوْا مُدبِرِين ‏(نمل: 80)इस लिये (ऐ हबीब!) बेशक आप न तो मृतकों (काफिरों) को अपनी पुकार सुनाते हैं और न ही बहरों को, जबकि वह पीठ फेरे जा रहे हैं।इस्लामी राष्ट्र की जागरूकता से मानवता के दुश्मनों की बीचारगी और परेशानी ने एक बार फिर उन्हें घिनौनी नीतियों का सहारा लेकर इस्लाम धर्म के खिलाफ अपनी ईर्ष्या को जाहिर करने पर मजबूर कर दिया है। इस बार एक ज़ायोनी / यहूदी निदेशक ने अपने जैसे विचार रखने वालों से बड़ी राशि लेकर पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही सल्लम और इस्लाम के खिलाफ एक ​​अपमानजनक फिल्म बनाई है।इस फिल्म में जो संयुक्त राज्य अमेरिका में ज़ायोनी यहूदियों, अमेरिका में शरणार्थी मिस्री काप्टिकों और पागल अमेरिकी पादरी के सहयोग से बनी है, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही व सल्लम और इस्लाम का ऐसा अपमान हुआ है जिसके बयान से ज़बान शरमाती है।विश्व अहलेबैत (अ) परिषद, सैकड़ों धार्मिक और शैक्षिक विचारकों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन के रूप में जो दुनिया के करोड़ों धरमनिष्ठों की सोच और शैक्षिक स्रोत की हैसियत रखता है इस सांस्कृतिक अपराध की प्रतिक्रिया के रूप में, दुनिया भर के मुसलमानों का ध्यान निम्नलिखित बिंदुओं की ओर दिलाना चाहता है:1. नबियों और धर्मों के निकटनबियों और धर्मों की सम्मानित हस्तियों का अपमान एक घोर पाप है जो किसी भी धर्म के निकट स्वीकार्य योग्य नहीं है। इसलिए जो लोग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही व सल्लम का अनादर करते हैं किसी भी धर्म व मकतब के पैरोकार नहीं हो बल्कि शैतान के अनुगामी हैं।2. सब जानते हैं कि इस्लाम से दनिया वालों को भयभीत करने की नीति (इस्लाम फ़ोबिया) 11 सितम्बर 2001 के बाद दुनिया में चरम को पहुंची; हाल के वर्षों में कलात्मक गुस्ताखियों के रूप में, कार्टून बनाने, कुरान जलाने और फिल्म बनाने की सूरत में दिखाई देती रही है। हालांकि पिछली गुस्ताखियों का आधार इस्लाम की शिक्षाओं की सही जानकारी नहीं होना था, लेकिन यह नई हरकत जैसा कि फिल्म (Innocence of Muslims या मुसलमानों की मासूमियत) के निदेशक ने खुद अमेरिकी और इस्राइली मीडिया से बातचीत करते हुए कहा: "पूरी जानकारी, इरादे और निश्टय पर आधारित है जिसके राजनीतिक उद्देश्य हैं"।3. इन घटिया और शर्मनाक दृश्यों के अलावा जो ध्यान देने योग्य भी नहीं हैं, इस फिल्म की खास बात यह है कि इसमें मुसलमानों को हिंसक, खूंखार और क्रूर इंसानों के रूप में परिचित कराया गया है। वास्तविकता यह है कि इस फिल्म ने कई अपराधों, अत्याचारों और अमानवीय दरंदिगियों को जो अमेरिकी, ब्रिटिश और इजरायली सैनिकों ने हाल के वर्षों में फ़िलिस्तीन, इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान की जनता के खिलाफ और इराक के अबूगुरैब जेल में निहत्थे कैदियों पर आज़माते रहे हैं, बहुत बेशरमी से इस्लाम और मुसलमानों से संबंधित करने की कोशिश की है, हालांकि इस्लाम दया, कृपा और मेहरबानी का दीन है और पैगम्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही व सल्लम ख़ुदा वन्दे आलम की गवाही के अनुसार सभी ब्राहमण्डों के लिए भाग्यशाली और रहमत हैं।4. उपरोक्त तथ्यों के आधार पर, वास्तविक मुसलमानों का हाथ कभी हिंसा और आतंकवाद और यातना से दूषित नहीं हुआ और न होगा; और जो लोग ऐसा कर रहे हैं वह वास्तव में वहाबी हैं, जिन्हें अमेरिका और पश्चिमी देशों की जासूसी एजेंसियों का औपचारिक समर्थन प्राप्त है और उनके हितों को पूरा करने के लिए वह आतंकी गतिविधियों में व्यस्त हैं।