31 अगस्त 2012 - 19:30

हम यहाँ इस उद्देश्य से एकत्रित हुए हैं कि परवरदिगार की सहायता और निर्देशन से इस अभियान और आंदोलन की, कि जिसकी छः दशक पहले कुछ हमदर्द राजनीतिक नेताओं की बुद्धिमत्ता परिस्थितियों की समझ के परिणाम स्वरूप शुरूआत हुई थी, उसे संसार की वर्तमान आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार आगे बढ़ाएं, बल्कि उसमें नई जान डालें और एक नई हलचल पैदा करें....

بسم‌ اللّه ‌الرّحمن ‌الرّحيم‌الحمد للہ ربّ العالمین و الصلاۃ و السلام علی الرسول الاعظم الامین و علی الہ الطاھرین و صحبہ المنتجبین و علی جمیع الانبیاء و المرسلین

 

प्रिय अतिथियों, गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों के प्रमुखों, प्रतिनिधि मंडलों और इस अंतर-राष्ट्रीय सम्मेलन में अन्य भाग लेने वालों का मैं स्वागत करता हूँ।हम यहाँ इस उद्देश्य से एकत्रित हुए हैं कि परवरदिगार की सहायता और निर्देशन से इस अभियान और आंदोलन की, कि जिसकी छः दशक पहले कुछ हमदर्द राजनीतिक नेताओं की बुद्धिमत्ता परिस्थितियों की समझ के परिणाम स्वरूप शुरूआत हुई थी, उसे संसार की वर्तमान आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार आगे बढ़ाएं,  बल्कि उसमें नई जान डालें और एक नई हलचल पैदा करें।भौगोलिक हिसाब से दूर और पास के क्षेत्रों से हमारे अतिथि यहाँ आए हैं जिनका संबन्ध अलग अलग राष्ट्र और नस्लों से है और जो विभिन्न प्रकार के विश्वास, संस्कृति, ऐतिहासिक और विरासती प्रष्ठभूमि रखते हैं लेकिन जैसा कि इस आंदोलन की नींव रखने वालों में से एक अहमद सूकारनू ने 1955 की मशहूर बान्डूँग बैठक में कहा था, कि गुट निरपेक्ष आंदोलन का आधार भौगोलिक, नस्ली, और दीनी रूप में समानता नहीं है बल्कि आवश्यकताओं का एक जैसा होना है। उस समय गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों को आपस में ऐसे रिश्ते की तलाश थी जो उन्हें पद के लालची, घमन्डी, और कभी सेर न होने वाले नेटवर्कों के क़ब्ज़े से बचाए रखे, शासन पसन्दी में विकास और बढ़ावे के बाद आज भी यह आवश्यकता उसी तरह मौजूद है।मैं एक और वास्तविकता सामने लाना चाहता हूँ।इस्लाम ने हमें यह सिखाया है कि नस्ल, ज़बान, और संस्कृति के एक जैसा न होने के बावजूद इंसानों के अन्दर एक जैसी फ़ितरत मौजूद है जो उन्हें पवित्रता, समानता, अच्छे काम करने, हमदर्दी, और एक दूसरे की सहायता की दावत देती है और यही सामान्य स्वभाव है जो गुमराह कर देने वाली भावनाओं से आसानी से गुज़र जाने की स्थिति में इन्सानों को तौहीद (एकेश्वरवाद) और अल्लाह की पहचान की तरफ़ ले जाता है।इस स्पष्ट वास्तविकता में ऐसी क्षमता है कि वह स्वतंत्र, सरबुलन्द और एक ही समय में विकास और समानता से सजे हुए समाज की बनावट का आधार और सहायक बन सकती है, इन्सानों की तमाम व्यक्तिगत और दुनियावी सरगर्मियों को आध्यामिकता की चमक दे सकती है और आख़ेरत की जन्नत से पहले जिसका वादा इश्वरीय धर्मों ने किया है दुनियावी जन्नत बना सकती है यही सामान्य और साझे की वास्तविकता है जो इन राष्ट्रों के भाईचारे का आधार बन सकती है जो ज़ाहिरी शक्ल व सूरत, इतिहास और भौगोलिक हिसाब से आपस में कोई समानता नहीं रखते।जब इस प्रकार के ढाँचे पर वैश्विक सहायता की बनावट होगी तो शासन भय व डर, कब्जा और एकतरफ़ा लाभ के आधार पर नहीं और अंत्रात्मा बेचने वाले और विश्वासघात करने वाले लोगों के ज़रिए नहीं बल्कि सेहतमंद, संयुक्त लाभ के आधार पर और इस से भी अधिक मानवता के लाभ को देखते हुए आपस में सम्बंध बनाऐंगे और अपने जागरूक दिल व दिमाग़ और अपने राष्ट्रों के दिलों को हर फ़िक्र से नजात दिला सकते हैं।यह व्यवस्था, चालू व्यवस्था के बिल्कुल विपरीत बिंदु पर है कि वर्तमान सदियों के दौरान क़ब्ज़ा करने की इच्छुक पश्चिमी शासन और आज अमरीका की आक्रमक और साम्राज्यवादी शासन जिस की ठेकेदार. प्रचारक और दावेदार है।प्रिय अतिथियों,छः दशक बीत जाने के बाद भी अब तक गुट निरपेक्ष आंदोलन का मौलिक उद्देश्य जीवित और अपने स्थान पर मौजूद हैः साम्राज्यवाद की समाप्ति, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रा, ताकत के ब्लाकों से दूरी और सदस्य देशों के बीच आपसी सम्बन्ध और सहयोग की उन्नति के उद्देश्य – संसार की वर्तमान वास्तविकताएं और इन उद्देश्यों के बीच दूरी अधिक है लेकिन इन वास्तविकताओं से गुज़रते हुए उद्देश्य तक पहुँच प्राप्त करने का सामाजिक संकल्प और सबके प्रयास ख़तरनाक लेकिन उम्मीद बढाने वाले और फल देने वाले है।कुछ दिनों पहले हम शीत युद्ध के समय की नीतियों और उसके बाद एकतरफ़ा कार्य प्रणाली की पराजय के गवाह रहे हैं। संसार इस ऐतिहासिक अनुभव से सबक़ प्राप्त करते हुए एक अंतर-राष्ट्रीय व्यवस्था की तरफ़ बढ़ रही है और गुट निरपेक्ष आंदोलन (इन परिस्थितियों में ) एक नई भूमिका अदा कर सकता है और उसे ऐसा अवश्य करना चाहिए। यह नया प्रबन्ध सामान्य हिस्सेदारी औऱ राष्ट्रों के बराबर अधिकार पर निर्मित होना चाहिए और इस नए प्रबन्ध के निर्माण के लिए हम आंदोलन के सदस्य देशों की एकता वर्तमान माँगों में से एक है।सौभाग्य से संसार में परिवर्तन का होना एक बहुध्रुवीय प्रबन्ध की ख़ुशख़बरी दे रहा है जिस में शक्ति की पारंपरिक धुरियों के स्थान विभिन्न आर्थिक, समाजिक और राजनीतिक स्रोत से सम्बन्धित विभिन्न देशों, संस्कृतियों और संस्कृति का एक संग्रह है। यह आश्चर्यजनक परिवर्तन जिन्हें हम वर्तमान तीन दशकों से देख रहे हैं यह साबित करती हैं कि नई शक्तियाँ पुरानी शक्तियों के जाने के बाद ही आती हैं शक्तियों का यह परिवर्तन गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों को यह समय देता है कि अंतर-राष्ट्रीय मैदान में सही और उचित भूमिका अदा करे और ज़मीन पर न्याय और सही मानो में हिस्सेदारी प्रबंधन व्यवस्था के लिए रास्ता तय्यार करें। हम गुट निरपेक्ष आंदोलन से सदस्य देशों के दृष्टिकोण और रूचि के हिसाब से एक दूसरे से अलग होने के बावजूद संयुक्त लक्ष्य की रौशनी में एक लम्बे समय तक अपने गठबंधन और आपस में सम्बंध को बनाए रखने में सफल हुए हैं और यह कोई मामूली और छोटी सफलता नहीं है। यह लगाव दो टूक और इन्सान दोस्ताना व्यवस्था के आधार पर बन सकता है।संसार की वर्तमान परिस्थितियाँ गुट आंदोलन के लिए शायद फिर हाथ न आने वाला अवसर है। हमारा दृष्टिकोण यह है कि संसार के नियंत्रण कक्ष का अधिकार मुट्ठी भर पश्चिमी देशों की तानाशाही शासनों के चंगुल में नहीं होना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन मामलों के मैदान में एक विश्व लोकतांत्रिक भागीदारी आविष्कार करने और सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। यह उन सभी देशों की आवश्यकता है जो कुछ तानाशाह और वर्चस्ववादी देशों के सीधे या परोक्ष रूप से हस्तक्षेप से नुकसान उठाते हैं और आज भी नुकसान उठा रहे हैं।इसी का गलत लाभ उठाते हुए अमेरिका और उसके सहयोगी, शरीफाना लिबास में अपना अधिपति संसार पर थोपने में सफल हुए। वह बात करते हैं मानवाधिकार की लेकिन उनकी मुराद पश्चिमी हित होते हैं, वह बात करते हैं डेमोक्रेसी की लेकिन उसके स्थान पर विभिन्न देशों में सैन्य हस्तक्षेप करते हैं, वह बात करते हैं आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की और शहरों और गांवों में रहने वाले निहत्थे लोगों को अपने बमों और हथियारों का निशाना बना देते हैं। उनकी निगाह के अनुसार मानवता पहले, दूसरे और तीसरे दर्जे के ना