30 अगस्त 2012 - 19:30

छः दशक बीत जाने के बाद भी अब तक गुट निरपेक्ष आंदोलन का मौलिक उद्देश्य जीवित और अपने स्थान पर मौजूद ۔۔۔۔......

प्रिय अतिथियों,छः दशक बीत जाने के बाद भी अब तक गुट निरपेक्ष आंदोलन का मौलिक उद्देश्य जीवित और अपने स्थान पर मौजूद हैः साम्राज्यवाद की समाप्ति, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रा, ताकत के ब्लाकों से दूरी और सदस्य देशों के बीच आपसी सम्बन्ध और सहयोग की उन्नति के उद्देश्य – संसार की वर्तमान वास्तविकताएं और इन उद्देश्यों के बीच दूरी अधिक है लेकिन इन वास्तविकताओं से गुज़रते हुए उद्देश्य तक पहुँच प्राप्त करने का सामाजिक संकल्प और सबके प्रयास ख़तरनाक लेकिन उम्मीद बढाने वाले और फल देने वाले है।कुछ दिनों पहले हम शीत युद्ध के समय की नीतियों और उसके बाद एकतरफ़ा कार्य प्रणाली की पराजय के गवाह रहे हैं। संसार इस ऐतिहासिक अनुभव से सबक़ हासिल करते हुए एक अंतर-राष्ट्रीय व्यवस्था की तरफ़ बढ़ रही है और गुट निरपेक्ष आंदोलन (इन परिस्थितियों में ) एक नई भूमिका अदा कर सकता है और उसे ऐसा अवश्य करना चाहिए। यह नया प्रबन्ध सामान्य हिस्सेदारी औऱ राष्ट्रों के बराबर अधिकार पर निर्मित होना चाहिए और इस नए प्रबन्ध के निर्माण के लिए हम आंदोलन के सदस्य देशों की एकता वर्तमान माँगों में से एक है।सौभाग्य से संसार में परिवर्तन का होना एक बहुध्रुवीय प्रबन्ध की ख़ुशख़बरी दे रहा है जिस में शक्ति की पारंपरिक धुरियों के स्थान विभिन्न आर्थिक, समाजिक और राजनीतिक स्रोत से सम्बन्धित विभिन्न देशों, संस्कृतियों और संस्कृति का एक संग्रह है। यह आश्चर्यजनक परिवर्तन जिन्हें हम वर्तमान तीन दशकों से देख रहे हैं यह साबित करती हैं कि नई शक्तियाँ पुरानी शक्तियों के जाने के बाद ही आती हैं शक्तियों का यह परिवर्तन गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों को यह समय देता है कि अंतर-राष्ट्रीय मैदान में सही और उचित भूमिका अदा करे और ज़मीन पर न्याय और सही मानो में हिस्सेदारी प्रबंधन व्यवस्था के लिए रास्ता तय्यार करें। हम गुट निरपेक्ष आंदोलन से सदस्य देशों के दृष्टिकोण और रूचि के हिसाब से एक दूसरे से अलग होने के बावजूद संयुक्त लक्ष्य की रौशनी में एक लम्बे समय तक अपने गठबंधन और आपस में सम्बंध को बनाए रखने में सफल हुए हैं और यह कोई मामूली और छोटी सफलता नहीं है। यह लगाव दो टूक और इन्सान दोस्ताना व्यवस्था के आधार पर बन सकता है।संसार की वर्तमान परिस्थितियाँ गुट आंदोलन के लिए शायद फिर हाथ न आने वाला अवसर है। हमारा दृष्टिकोण यह है कि संसार के नियंत्रण कक्ष का अधिकार मुट्ठी भर पश्चिमी देशों की तानाशाही शासनों के चंगुल में नहीं होना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन मामलों के मैदान में एक विश्व लोकतांत्रिक भागीदारी आविष्कार करने और सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। यह उन सभी देशों की आवश्यकता है जो कुछ तानाशाह और वर्चस्ववादी देशों के सीधे या परोक्ष रूप से हस्तक्षेप से नुकसान उठाते हैं और आज भी नुकसान उठा रहे हैं।