6 दिसंबर 2011 - 20:30

..... कई वर्षों से लगातार आतंकवादी पश्चिमी देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों की सहायता से और पश्चिमी देशों की वित्तीय सहायता और समर्थन से अहलेबैत के चाहने वालों को एराक़, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और दूसरे अन्य देशों में अपने आतंक का निशाना बनाते रहे हैं। अतः अहलेबैत के मानने वाले समाज को और स्वतंत्र तथा उत्पीड़ितों को इन आतंकी घटनाओं की समीक्षा करते हुए इस गंभीर समस्या का समाधान ढ़ूंढ़ना चाहिए और आतंकवाद से मुक़ाबले के लिए गंभीर रूप से योजना तैयार करना चाहिए.....

अहलेबैत समाचार एजेंसी (अबना) संवाददाता की रिपोर्ट के अनुसार विश्व अहलेबैत परिषद ने जारी अपने बयान में नवीं और दसवीं मुहर्रम को आतंकवादी हमलों विशेष कर इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में हुए विस्फ़ोटों की कड़ी निन्दा की है जिसके परिणाम स्वरूप सैकड़ों शिया श्रद्धालु शहीद हो गए थे। इस बयान में मुस्लिम उलेमा और मुफ़्तियों से माग की गई है कि इन आतंकी घटनाओं के सम्मुख अपनी चुप्पी तोड़ें।

इसी प्रकार इस बयान में दुनिया भर के शियों और धर्मनिष्ठ मुसलमानों से मांग की गई है कि विरोध प्रदर्शनों द्वारा शहीदों पर हुए अत्याचार के संदेश को दुनिया वालों के कानों तक पहुंचाएं।

बयान इस प्रकार हैः

بسم الله الرحمن الرحیم

« يُرِيدُونَ لِيُطْفِؤُوا نُورَ اللَّهِ بِأَفْوَاهِهِم واللَّهُ مُتِمُّ نُورِه ولَو كَرِهَ الْكَافِرُون »

کل یوم عاشوراء و کل ارض کربلاء

एक ओर जहां शिया एक बार फिर इस्लामी ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम के नाती इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आत्मोत्सर्ग तथा त्याग की याद मना रहे थे। और मानव जीवन को अमर बना देने वाली इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद व नाम की सुगन्ध मजलिसों और धार्मिक सभाओं को सुगन्धित कर रही थी, मानवता के शत्रुओं के अशुद्ध हाथों ने  अफगानिस्तान की राजधानी काबुल, कंधार और मजार ए शरीफ तथा पाकिस्तान व एराक़ में सैकड़ों हुसैनी अज़ादारों अर्थात शोकाकुलों को ख़ून की होली में नहला दिया।

इन आतंकी घटनाओं में घायल और शहीद होने वालों का इसके अतिरिक्त कोई पाप न था कि वह शोकाकुल अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की सहानुभूति के लिए कर्बला वालों के बहे ख़ून के संदर्भ में अपने प्रेम और आस्था का प्रदर्शन कर रहे थे। और हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम के लाए हुए शुद्ध इस्लाम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम और उनके पवित्र वंश की अभिभावकता और अधिकारों के प्रमाणित करने पर अग्रसर थे। 

 इस आपदा की गंभीरता को दृष्टिगत रखते हुए विश्व अहलेबैत परिषद (मजमए जहानी अहलेबैत) जो एक ऐसी अंतर राष्ट्रीय संस्था है कि जिसके सदस्य विश्व की महान और कुलीन हस्तियाँ हैं, दुनिया वालों का ध्यान निम्लिखित प्वाइंट्स की ओर केंद्रित करना चाहता हैः

1. आज के वर्तमान समय में जब मुसलमान जागरूक हो गए हैं और मिस्र, ट्यूनीशिया, लीबिया, बहरैन व यमन में मुसलमान, ईरान की इस्लामी क्रांति और लेबनान व एराक़ के इस्लामी प्रतिरोध के अनुकरण में अपने इतिहास में एक नए पन्ने का निर्माण कर रहे हैं, और हमारे शत्रु जो जानते हैं की हमारी सफलता का भेद क़ुरआन व इतरत (हज़रत मुहम्मद स. का वंश) की शिक्षाओं के पालन करने में निहित है, हताश प्रयास कर रहे हैं कि अहलेबैत के मानने वालों के नरसंहार द्वारा उनको आगे बढ़ने से रोका जाए।

2.इस्लाम के शत्रु जान लें कि अगर उन्होंने कल अमीरूलमोमिनीन को शहीद करके या इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिमस्सलाम को शहीद करके अगर लक्ष्य तक पहुंच गए हों तो आज अहलेबैत के अनुयायिओं के ख़ून की होली खेलकर वह अपने अपवित्र व अशुभ लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। परन्तु कदापि ऐसा नहीं हो सकता है कि शत्रु अपने इस षड़यंत्र में सफल हो सकें और अल्लाह के नूर को बुझा सकें बल्कि वह अपने इन कार्यों से अपनी ही नष्टता के मार्गों को समतल बना रहे हैं।

3.यद्धपि हम अपने सहपाठियों एंव सहधर्मियों के दुख के कारण शोकाकुल हैं परन्तु अनभिज्ञ शत्रु जान लें कि ईश्वर के मार्ग में शहादत हमारी चिरकालीन इच्छा है। और शहीद के रक्ति की हर बूंद स्वतंत्रता के शक्तिशाली पेड़ की सिंचाई करती है। और अपने धर्म व विश्वास के मार्ग में हमें और दृढ़ करती है।

4.अफ़ग़ानिस्तान की उत्पीड़ित जनता पूर्वी साम्राज्यवाद के विरूद्ध जेहाद करती रही है और आज उनके ज़मीनी व हवाई हमलों का निशाना बन रही है परन्तु इस्लामी सिद्धांतों की पालनकर्ता है।इस राष्ट्र ने अब तक दस लाख से अधिक शहीद और लाखों घायलों तथा उत्पीड़ितों का बलिदान दिया है।  और लाखों लोग दूसरे देशों में जीवन व्यवतीत कर रहे हैं परन्तु अल्लाह, उसके रसूल और अहलेबैत पर विश्वास में कमी नहीं आई है।

5.इस्लाम के शत्रु एक बार फिर से अपने भेद भाव की नीति के अंतर्गत शासन करने की अपनी पुरानी स्कीम को जारी करने का प्रयास कर रहे हैं। इस निंदित योजना के सम्मुख शिया और सुन्नी एकता की अत्याधिक आवश्यकता है।जिस प्रकार अफ़ग़ानी जनता ने सिद्ध किया है कि वह मज़हबी झगड़ों से दूर रहे हैं, हमें आशा है कि अब भी इससे दूर रहेंगे।

6.कई वर्षों से लगातार आतंकवादी पश्चिमी देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों की सहायता से और अरब देशों की वित्तीय सहायता और समर्थन से अहलेबैत के चाहने वालों को एराक़, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और दूसरे अन्य देशों में अपने आतंक का निशाना बनाते रहे हैं। अतः अहलेबैत के मानने वाले समाज को और स्वतंत्र तथा उत्पीड़ितों को इन आतंकी घटनाओं की समीक्षा करते हुए इस गंभीर समस्या का समाधान ढ़ूंढ़ना चाहिए और आतंकवाद से मुक़ाबले के लिए गंभीर रूप से योजना तैयार करना चाहिए।

7.लोकतंत्र और मानवाधिकार का नारा लगाने वाली तथाकथित संस्थाओं ने इसे अहलेबैत के चाहने वालों तथा वास्तविक स्वतंत्रा सेनानियों के नरसंहार के रूप में उपयोग किया है। अगर यह संस्थाए वास्तव में मानवाधिकार की संरक्षक हैं तो वह अपने शासनों को इस नरसंहार से क्यों नहीं रोकती हैं?

8.करज़ई का बोन सम्मेलन से स्वदेश वापसी पर सुरक्षा अधिकारियों की आपात बैठक बुलाकर कल काबुल और मज़ारे शरीफ़ में हुए विस्फोटों का विवरण मांगना अवश्य सहानुभूति का करण है परन्तु वास्तव में तभी शहीदों के परिवारजनों को सुकून मिलेगा जब इन आतंकी घटनाओं के वास्तविक व गुप्त अपराधियों पर्दा फ़ाश किया जाए और उन्हें उनके किए की सज़ा मिले।और इसके लिए आपसी एकता को बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक है।

9. इन बर्बताओं और आतंकी घटनाओं में सऊदी शासन और वहाबी मुफ़्तियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है अतः उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि जल्दी ही उन्हें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम को मुंह दिखाना है।और अपने इन कामों का उत्तर देना है।

 10. विभिन्न देशों उलेमा औऱ बुद्धिजीवियों को जान लेना चाहिए कि वह इन घटनाओं के लिए उत्तरदायी हैं। प्रश्न यह उठता है कि अनंनतः कब तक उलेमा खामोश रहेंगे? वह अल्लाह का कल्मा पढ़ने वालों के नरसंहार की निंदा क्यों नहीं करते है? मुसलमानों की नरसंहार के हराम होने की घोषणा क्यों नहीं करते? उलेमा को जान लेना चाहिए कि अपनी खामोशी से वास्तव में अत्याचारियों का समर्थन कर रहे हैं। और इसके लिए उन्हें जवाब देना होगा।

11.विश्व अहलेबैत परिषद इन निंदनीय व घिनौनी आतंकी घटनाओं की घोर निंदा करता है।और दुनिया भर के स्वाभिमानी भाषणकर्ताओं तथा उलेमा से आग्रह करता है कि वह इन उत्पीड़ितों की आवाज़ को दुनिया वालों तक पहुंचाएं। आतंकवाद के विरूद्ध प्रदर्शन करें।और क़ानूनी मार्गों से इन उत्पीड़ितों का समर्थन करें तथा आतंकी घटनाओं के विरूद्ध कार्यवाही करें।

और अंत में इमाम हुसैन के इन अज़ादारों की शहादत के दुखद अवसर पर इमामे ज़माना, इस्लामी क्रा