27 नवंबर 2011 - 20:30

लखनऊ शहर सहित पूरे प्रदेश में मुहर्रम का चांद नज़र आते ही ग़म की लहर दौड़ गई। मजलिसो-मातम का सिलसिला शुरू हो गया.....

चारों तरफ़ बुलन्द हुईं मजलिसो-मातम की आवाज़ें

लखनऊ शहर सहित पूरे प्रदेश में मुहर्रम का चांद नज़र आते ही ग़म की लहर दौड़ गई। मजलिसो-मातम का सिलसिला शुरू हो गया। लोग ग़मे हुसैन में मसरूफ़ हो गए। हर साल की तरह इस साल भी लखनऊ के एतिहासिक इमामबाड़ा ग़ुफ़रान-मऑब में मुहर्रम की पहली मजलिस को मौलाना सय्यद कल्बे जवाद नक़वी ने सम्बोधित किया। पहली मुहर्रम को रविवार होने की वजह से बड़ी संख्या में मर्द, औरत एवं बच्चों ने मजलिस में शिरकत की। उन्होने मजलिस को सम्बोधित करते हुए कहा कि अगर परवरदिगार-ए-आलम चाहता तो बिना नबियों व इमामो को भेजे ही हम तक इस्लाम पहुंचा सकता था परन्तु उसने नबियों व इमामों को इसलिए भेजा ताकि वह लोगों तक व्यावहारिक ढंग से इस्लाम पहुंचा सकें और किसी को यह कहने का मौक़ा न मिल सके कि इस्लाम धर्म के नियम बहुत ही कठोर व वास्तविकता से दूर हैं बल्कि नबियों व इमामों को नमून-ए-अमल बनाकर यह साबित कर दिया कि अगर इन्सान अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखे तो वह बहुत आसानी के साथ ख़ुदा वन्दे आलम का ख़ास बन्दा बन सकता है। उन्होने कहा कि रसूले इस्लाम के बाद इस्लाम बहुत ही मुश्किल दौर में था लेकिन हज़रत इमाम हुसैन (अ.) ने अपनी अज़ीम क़ुरबानी देकर इस्लाम को नई ज़िन्दगी दी, अगर इमाम हुसैन (अ.) ने यह क़ुबानी न दी होती तो इस्लाम आज सिर्फ़ इतिहास के पन्नों में होता। फ़ज़ाएले आले मुहम्मद के बाद उन्होने अपने रवायती अन्दाज़ में हज़रत मुस्लिम (अ.) के मसाएब बयान किये जिन्हे सुनकर लोग अपने आंसू न रोक सके और ज़ारो-क़तार रोने लगे।

समाचार समाप्त

.........

166