30 दिसंबर 2020 - 15:50
इस क्षेत्र में पूरी तरह चीन पर निर्भर हो गया है अमरीका...दुर्लभ खदानों के मामले में चीन है अमरीका की सबसे बड़ी कमज़ोरी

अमरीका में जिमी कार्टर के राष्ट्रपति काल से ही और 1970 के दशक के तेल संकट के समय से ही अमरीका ने ऊर्जा के क्षेत्र में आत्म निर्भरता की कोशिश शुरू कर दी थी।

मगर निरंतर पैदा होने वाले तेल संकटों, तेल की क़ीमतों में बहुत अधिक उतार चढ़ाव और दुनिया के स्वच्छ ऊर्जा की ओर आगे बढ़ने के कारण वाशिंग्टन को यह पता चला कि वह ऊर्जा के क्षेत्र में तेल और गैस जैसे भूमिगत ऊर्जा संसाधनों की मदद से हमेशा आत्म निर्भर नहीं रह सकता।

अमरीकी वेबसाइट आयल प्राइस में लेखक एलेक्स कीमानी ने लिखा कि अधिकतर अमरीकी यह मानते हैं कि अमरीकी सरकार को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए ताकि जलवायु परिवर्तन के भारी संकट से भी किसी तरह बचा जा सके।

इस समय जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ रही है तो अमरीका को दुर्लभ खदानों के मामले में पूरी तरह चीन पर निर्भरता का सामना भी करना पड़ रहा है। अमरीका स्वच्छ ऊर्जा के प्रतिष्ठानों के निर्माण के लिए दुर्लभ खनिज पदार्थों के मामले में चीन पर निर्भर है।

सौर्य ऊर्जा पैनलों, विंड मिल, इलेक्ट्रिक कार की बैटरियों, मोबाइल फ़ोन, नेशनल रक्षा सिस्टम, चिकित्सा उपकरणों यहां तक कि तेल और गैस टेक्नालोजी से जुड़े उद्योग के निर्माण के लिए प्रयोग होने वाला 80 प्रतिशत कच्चा माल अमरीका को चीन से मिलता है।

इस स्थिति को देखते हुए अमरीका ख़ुद को ख़तरे में महसूस कर रहा है विशेषकर इसलिए भी कि दोनों देशों के बीच तनाव थमने का नाम नहीं ले रहा है। 2020 में व्यापारिक युद्ध जब चरम बिंदु पर था तो चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दुर्लभ खनिज पदार्थों की एक वर्कशाप का दौरा किया था जिससे नई अटकलें शुरू हो गई थीं और आशंका जताई जाने लगी थी कि चीन इशारा दे रहा है कि वह अमरीका को दुर्लभ खनिज पदार्थों की सप्लाई रोक सकता है जिसके नतीजे में अमरीका का एक बहुत बड़ा औद्योगिक सेक्टर ठप्प पड़ सकता है।

अब जब जो बाइडन वाइट हाउस में प्रवेश करने की तैयारी कर रहे हैं तो अमरीका को यह अच्छी तरह आभास है कि उसके बहुत से उद्योगों की गर्दन चीन के हाथ में जकड़ी हुई है। इसलिए दोनों देशों के बीच किसी समझौते की भी संभावना है।

दुर्लभ खनिज पदार्थों को केमिकल विटामिन भी कहा जाता है। यह वह पदार्थ हैं जो महत्वपूर्ण उपकरणों और यंत्रों के निर्माण में इस्तेमाल होते हैं। इनकी मात्रा कम है मगर उपयोगिता बहुत ज़्यादा होती है। लैनथेनम, न्योडीमियम, प्रेज़ियोडीमियम, गैडोलीनियम और यूरोपियम जैसे पदार्थों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल स्मार्ट फ़ोन, बैट्रियों, लेज़र, मिसाइलों, सेंसर सहित अनेक संवेदनशील उपकरणों के निर्माण में होता है।

पिछले दस साल के दौरान चीन ने इस प्रकार के 90 प्रतिशत पदार्थ तैयार किए हैं अलबत्ता पिछले साल इस मात्रा में कुछ गिरावट आई है।

अमरीका ने वर्ष 2018 में 35 खदानों की निशानदेही की थी जिन्हें अमरीकी अर्थ व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना गया। अमरीका इन खदानों के आयात पर निर्भर है जिसके नतीजे में चीन का वर्चस्व मज़बूत हो रहा है।

दुनिया में दुर्लभ खनिज पदार्थों से चलने वाले उद्योगों का मूल्य 2018 में 8.1 अरब डालर था जो 2025 तक बढ़कर 14.4 अरब डालर तक पहुंच जाएगा क्योंकि दुनिया में इलेक्ट्रिक कारों और मोबाइल फ़ोन जैसे उपकरणों की मांग तेज़ी से बढ़ रही है।

जो बाइडन को इस स्थिति की गंभीरता का पूरी तरह अनुमान है इसीलिए वह शुरू से ही दुर्लभ खनिज पदार्थों की खोज पर ज़ोर दे रहे हैं। उन्होंने इस क्षेत्र में निवेश के लिए इन्सेन्टिव देने की बात भी कही है।

स्रोतः अलजज़ीरा