हम यह नहीं मानते कि इस्राईल और अमरीका ने ईरान पर हमले की योजना बनाई है और हमले के बाद ईरान की जवाबी कार्यवाही से बचने के लिए उन्होंने यह तैयारियां की हैं। हमारे इस विचार की वजह यह है कि यमन युद्ध ने साबित कर दिया कि कितनी ही बड़ी शक्ति क्यों न हो अगर उसने युद्ध शुरू किया तो ज़रूरी नहीं है कि उसे वांछित नतीजे भी मिल जाएं। यही सच्चाई 2006 के लेबनान युद्ध में सामने आई थी।
यह तो साफ़ है कि फ़ार्स खाड़ी के इलाक़े में कई जगहों पर तनाव बढ़ रहा है और आशंका बनी हुई है कि कहीं से भी चिंगारी निकल सकती है बस यह देखना है कि पहली गोली कौन चलाता है, ईरान जो जनरल क़ासिम सुलैमानी की शहादत का बदला लेने का एलान करता आ रहा है या इस्राईल जो मिसाइलों के जंगल के बीच में फंस गया है और विस्फोटक हो चुके राजनैतिक संकट से जूझ रहा है या अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प जो चुनाव में अपनी हार मानने के लिए अब तक तैयार नहीं हैं या फिर कोई अलग ही शक्ति यह क़दम उठाकर सारे पक्षों को लंबी लड़ाई में खींच लेने के लिए घात में बैठी है।
अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प कहते हैं कि इलाक़े में एक भी अमरीकी सैनिक मारा गया तो इसका नतीजा ईरान को भुगतना होगा।
हमें अलग अलग सूत्रों से जो सूचनाएं मिल रही हैं वह बताती हैं कि सबसे ज़्यादा भयभीत इस्राईल है क्योंकि उसके नेतृत्व को अच्छी तरह मालूम है कि जनरल क़ासिम सुलैमानी के इंतेक़ाम के लिए किए जाने वाले किसी भी हमले में उसे ज़रूर निशाना बनाया जाएगा। यही वजह है कि इस्राईल में हाई एलर्ट है जबकि इस्राईल के भीतर इस भय के चलते लोग बुरी तरह बटते जा रहे हैं।
इस समय इलाक़े में मनोवैज्ञानिक युद्ध भी चल रहा है जबकि संभावित युद्ध की तैयारी भी ज़ोरों पर है।
इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बयान इस्राईली सेना के प्रवक्ता हीदाय ज़ीलबरमैन ने दिया। प्रवक्ता ने कहा कि ईरान की ओर से इस्राईल पर हमला यमन या इराक़ से हो सकता है, हमें जानकारी है कि ईरान दोनों ही देशों में ड्रोन विमान और गाइडेड मिसाइल डेवलप कर रहा है जो इस्राईल तक पहुंच सकते हैं।
एक और महत्वपूर्ण बयान ईरान की संसद में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के सदस्य अबुल फ़ज़्ल अमूई ने दिया। उन्होंने कहा कि फ़ार्स खाड़ी में अगर इस्राईली पनडुब्बी आती है तो इसे शत्रुता की कार्यवाही माना जाएगा और हमें इंतेक़ाम लेने का हक़ होगा। ईरान जब इंतेक़ाम लेने का इरादा करेगा तो खुले आम यह काम करेगा उसे प्रक्सी संगठन की ज़रूरत नहीं होगी।
यह पहला अवसर है कि किसी इस्राईली अधिकारी ने खुलकर बयान दिया है कि हमें इराक़ या यमन से हमला हो जाने का डर है।
इराक़ की मज़बूत हश्दुश्शअबी फ़ोर्स जो दाइश का मुक़ाबला करने के लिए गठित हुई थी अब बड़ी ताक़तवर फ़ोर्स के रूप में देखी जाती है और ईरान से उसके गहरे संबंध हैं। यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन को भी अब क्षेत्रीय ताक़त के रूप में देखा जाता है जिसने सऊदी अरब के तेल, आर्थिक व सामरिक प्रतिष्ठानों पर बड़ी कामयाबी से हमले करके अपनी ताक़त का लोहा मनवा लिया है।
अंसारुल्लाह आंदोलन के प्रमुख अब्दुल मलिक हौसी बयान दे चुके हैं कि अगर इस्राईल ने यमन के ख़िलाफ़ कोई हिमाक़त की तो इस्राईल के भीतर निर्णायक हमले किए जाएंगे, हमने छह साल की जंग में अपनी ताक़त का परिचय अच्छी तरह दे दिया है।
इस्राईलियों को हालात का अच्छी तरह अंदाज़ा हो चुका है। उन्हें मालूम है कि यमन के जो मिसाइल सऊदी अरब के जिद्दा, रियाज़ और यंबो जैसे शहरों तक पहुंच चुके हैं वह इस्राईल के ईलात और बेर सबा तक भी पहुंच सकते हैं।
आख़िर में हम यह कहना चाहते हैं कि इस्राईल उस दिन से डरे जब ट्रम्प और उनके घटक उसे यमन युद्ध में ढकेल देंगे। अगर इस्राईल यमन युद्ध में फंसा तो यह उसकी आख़िरी जंग होगी, क्योंकि फिर इस्राईल नाम की कोई चीज़ शायद बाक़ी नहीं रहेगी।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार