28 दिसंबर 2020 - 16:33
ईरान का न तो कोई प्राॅक्सी है और न ही उसे किसी प्राॅक्सी की ज़रूरत है!

अमरीकी साम्राज्य व अवैध ज़ायोनी शासन से संघर्ष हालांकि क्षेत्र में प्रतिरोध के मोर्चे में शामिल सभी सदस्यों का संयुक्त लक्ष्य है लेकिन अमरीका, इस्राईल व सऊदी अरब का त्रिकोण यह ज़ाहिर करने की कोशिश करता है कि अमरीका व इस्राईल से दुश्मनी का आधार अरबी पहचान नहीं है बल्कि यह चीज़ ईरान ने अरबों के बीच अपने प्राॅक्सी पार्टनर्ज़ के ज़रिए उन पर थोपी है।

ज़ायोनी सेना के प्रवक्ता का हालिया बयान वास्तविकताओं को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की इसी कड़ी का सिलसिला है। इस्राईली सेना के प्रवक्ता ने कहा है कि तेल अवीव यमन व इराक़ की स्थिति पर नज़र रखे हुए है क्योंकि संभव है कि ईरान (शहीद फ़ख़्रीज़ादे के ख़ून का) बदला लेने के लिए इन देशों से इस्राईल पर कोई हमला करवा सकता है। अस्ल में अमरीका-इस्राईल व रुढ़िवादी अरब सरकारों का दुष्ट त्रिकोण क्षेत्र में प्रतिरोध के मोर्चे विशेष कर इराक़ में हश्दुश्शाबी और यमन में अंसारुल्लाह को बदनाम करने की कोशिश में है ताकि यह दर्शा सके कि ये संगठन अपने देश व अपने राष्ट्र के हितों पर ईरान के हितों को प्राथमिकता देते हैं।

 

अगर यह मान भी लिया जाए कि ज़ायोनी सेना के प्रवक्ता का बयान सही है तब भी इस बात में क्या बुराई है कि प्रतिरोधकर्ता गुट ईरान की मदद करें? क्या ईरान, अमरीका व इस्राईल के मुक़ाबले में फ़िलिस्तीनी काॅज़ और अरब व इस्लामी राष्ट्रों की मदद नहीं करता? क्या इसी लिए चालीस साल से वह प्रतिबंध, दबाव, युद्ध और घेराबंदी सहन नहीं कर रहा है? तो फिर क्यों प्रतिरोध के मोर्चे के सदस्यों से यह चाहा जाता है कि वह सच की ओर से आंख मूंद लें?!

 

जब ईरान ने बग़दाद में शहीद क़ासिम सुलैमानी और उनके साथियों की हत्या के जघन्य अपराध के जवाब में इराक़ में अमरीका की सबसे बड़ी सैन्य छावनियों पर मीज़ाइलों की बारिश कर दी थी, जो दूसरे विश्व के बाद दुनिया के इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी, तो उसने औपचारिक रूप से इस काम का दायित्व स्वीकार किया था। इस आधार पर शहीद फ़ख़्रीज़ादे के ख़ून का बदला भी पूरी तरह से ईरानी होगा। इस महान शहीद की हत्या तेहरान में की गई थी और इस्राईल को इसके जवाब की उस समय प्रतीक्षा करनी चाहिए जिस समय की उसे आशा भी नहीं होगी। 

 

जब अमरीका, जो दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति होने का दावा करता है, ऐनुल असद में एक ज़न्नाटेदार थप्पड़ खा चुका है तो इस्राईल को जो अमरीका से कहीं कमज़ोर है, ईरान के जवाब की ज़रूर प्रतीक्षा करनी चाहिए और उस पर ईरान का वार उस जगह से होगा जिसकी उसे आशा भी नहीं होगी। ज़ायोनी शासन झूठ और धोखे से अपने आपको नहीं बचा सकती क्योंकि ईरान का कोई प्राॅक्सी नहीं है बल्कि ईरान के कुछ घटक हैं जिनके लक्ष्य व उमेंगें वही हैं जो ईरान की हैं। अगर अमरीका और इस्राईल ने ईरान को निशाना बनाने की कोशिश की तो उन्हें पूरी तरह से ईरानी जवाब का सामना करना पड़ेगा और इस संबंध में दोनों ही के अत्यंत कटु अनुभव हैं।

 

 इराक़ में हश्दुश्शाबी और यमन में अंसारुल्लाह को बदनाम करने और उन्हें ईरान का प्राॅक्सी पार्टनर बताने की दुष्टतापूर्ण कोशिश विफल हो कर रहेगी जिस तरह से लेबनान के हिज़्बुल्लाह व फ़िलिस्तीन के हमास व जेहादे इस्लामी संगठनं के संबंध में इस तरह के प्रयास नाकाम हो चुके हैं। अरब राष्ट्र, ईरान व प्रतिरोध के मोर्चे की सच्चाई व निष्ठा से पूरी तरह अवगत हैं और इसी तरह वे अमरीका, इस्राईल व रुढ़िवादी अरब सरकारों की धूर्तता व छल-कपट को भी अच्छी तरह जानते हैं और ज़ायोनी शासन से संबंध स्थापित करने के कुछ अरब सरकारों के क़दम के बाद तो यह सच्चाई अधिक स्पष्ट हो गई है।