ग्रेग कार्लस्ट्रोम ने एकॉनोमिस्ट में लिखा है कि कई दशकों से तेल पैदा करने वाले अरब देश, समस्या में हैं, जब तेल की क़ीमत कम होती है तो कहते हैं कि तेल पर अपनी निर्भरता कम करेंगे जब सच्चाई यह है कि जब तेल की क़ीमत कम होती है तो वह भारी खर्चे वाले सुधार कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ा सकते। फिर उत्पादन कम हो जाता है, मांग बढ़ जाती है और क़ीमत फिर से ठीक हो जाती है। कई दशकों से यही सिलसिला चल रहा है।
बहुत से लोग यह सोचने लगे हैं कि क्या यह चक्र खत्म होने वाला है? क्या अर्थ व्यवस्था में सुधार का समय आ गया है? कोविड-19 की वजह से तेल की मांग में जो कभी आयी उसकी वजह से सन 2020 में ब्रंट तेल की क़ीमत 21 डॉलर तक पुहंच गयी, सन 2021 में तेल की क़ीमत बढ़ेगी लेकिन इस बात की संभावना बहुत कम है कि वह 51 डॉलर तक पहुंच जाए। तेल की क़ीमत में बहुत अधिक वृद्धि की उम्मीद करना बेकार है और जो भी हो यह पक्का है कि तेल बेच कर देश चलाने वाले मध्य पूर्व के देश, अपने बजट में संतुलन बनाने में सक्षम नहीं हैं।
सऊदी अरब, क्षेत्र में तेल पैदा करने वाला सब से बड़ा देश है लेकिन वह तेल से हट कर आमदनी के स्रोतों की खोज जारी रखे हुए है। इस देश ने जूलाई में वैट को तीन गुना बढ़ा दिया, सऊदी अरब में बहुत से लोगों को यह आशा था कि 5 प्रतिशत से 15 प्रतिशत की वृद्धि अस्थाई होगी लेकिन अब उन्हें भी निराश होना पड़ेगा क्योंकि सऊदी अरब यह काम करने वाला नहीं है।