शब्दों की संख्या के लिहाज़ से छोटी सी खबर है मगर राजनीति और रणनीति में उसके बहुत से अर्थ हैं। यह खबर अधिकांश अरब समाचार पत्रों में आर्थिक समाचारों के हिस्से में प्रकाशित हुई लेकिन इस छोटी सी खबर से यह साबित हो गया कि सऊदी अरब और परमाणु शक्ति से संपन्न एकमात्र इस्लामी देश पाकिस्तान में तनाव इस हट तक बढ़ गया है कि दोनों में रिश्ता ही पूरी तरह से खत्म हो सकता है।
खबर में बताया गया है कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब से जो तीन अरब डॉलर का क़र्ज़ा लिया था उसका एक अरब डॉलर और वापस कर दिया है और अब सिर्फ एक ही अरब डॉलर का क़र्ज बचा है जिसे पाकिस्तानी सरकार जनवरी में अदा कर देगी। यह अदाएगी चीन से आसान क़र्ज़ मिलने के बाद की जाएगी।
पिछले सत्तर वर्षों से एक दूसरे के निकट सहयोगी रहे सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच इस तनाव के कारणों पर विभिन्न विचार पेश किये जा रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी अरब बुरी तरह से आर्थिक समस्याओं में घिरा हुआ है और उसे सन 2021 के बजट में 40 अरब डॉलर का घाटा हो रहा है जिसे पूरा करने के लिए वह अपना क़र्ज़ा इमरान खान से वापस मांग रहा है जो सऊदी अरब के बहुत निकट नहीं हैं। जबकि कुछ विशेषज्ञ, सऊदी अरब की नाराज़गी की वजह, भारत और सऊदी अरब में निकटता तथा दूसरी ओर ईरान व पाकिस्तान के बीच निकटता बता रहे हैं।

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच इस भयानक विवाद के बारे में कुछ बिन्दु विचार योग्य हैः
1. सऊदी अरब और पाकिस्तान में विवाद का आरंभ मार्च सन 2015 में यमन युद्ध के आरंभ के साथ ही शुरु हो गया था क्योंकि इस्लामाबाद ने इस युद्ध में भाग लेने के लिए अपने सैनिक सऊदी अरब भेजने से इन्कार कर दिया था इसी तरह पाकिस्तान ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस बिन सलमान द्वारा सऊदी अरब के नेतृत्व में " इस्लामी देशों के नेटो" बनाने के प्रस्ताव में भी शामिल होने से इन्कार कर दिया था।
2. पाकिस्तान और सऊदी अरब में तनाव में उस समय असाधारण रूप से वृद्धि हो गयी जब सऊदी अरब ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की नियंत्रण रेखा को खत्म कर दिया जिसका मतलब यह निकाला गया कि उसने इस हिस्से पर भारत के अधिकार को स्वीकार कर लिया है। सऊदी अरब ने गत महीने की 21-22 तारीख को गुट- 20 की मेज़बानी की खुशी में 20 रियाल के सिक्के जारी किये जिस पर दुनिया का नया नक्शा था और उसमें कश्मीर की नियंत्रण रेखा का पता नहीं था।
3. पाकिस्तान के विदेशमंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने सऊदी अरब को धमकी दी जिसे सऊदी अरब ने अपने लिए अपमान समझा। उन्होंने धमकी दी थी कि अगर सऊदी अरब ने ओआईसी की अपातकालीन बैठक में कश्मीर और भारत के उल्लंघनों के विषय को अपने एजेन्डे में नहीं रखा तो पाकिस्तान किसी और संगठन में शामिल हो जाएगा जिसका साफ अर्थ यह था कि वह चीन के नेतृत्व में ईरान व तुर्की के मोर्चे में जाने की बात कर रहे थे जो सऊदी अरब का घोर विरोधी है। सऊदी अरब ने अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए पाकिस्तान से अपना क़र्ज़ा वापस मांगना शुरु कर दिया।
4. पाकिस्तान के सेना प्रमुख जावेद क़मर बाजवा ने सऊदी अरब के साथ अपने अच्छे संबंधों के मद्दे नज़र संबंध सुधारने की कोशिश की और इसी लिए उन्होंने रियाज़ की यात्रा भी की लेकिन सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और रक्षा मंत्री, मुहम्मद बिन सलमान ने उनसे मिलने से ही इन्कार कर दिया और वह खाली हाथ इस्लामाबाद लौट गये जिसकी वजह से पाकिस्तान की सेना को भी अपमान का आभास हुआ और सेना में भी सऊदी अरब के प्रति आक्रोश फैल गया।
5. पाकिस्तान में इमरान खान के सत्ता में पहुंचने के बाद से जिस तरह से पाकिस्तान ईरान से निकट हो रहा है उससे सऊदी अरब को बहुत झटका लगा है। यह कहा दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुलक़दीर खान ने ईरानी वैज्ञानिकों के साथ परमाणु हथियार बनाने की जानकारियां साझा की हैं। इसके साथ ही इमरान खान दिसंबर सन 2019 में मलेशिया के प्रधानमंत्री महातीर मुहम्मद द्वारा रजब तैयब अर्दोगान के साथ मिल कर उस सम्मेलन में भाग लेने पर भी तैयार हो गये थे जिसका मक़सद, सऊदी प्रभाव वाले ओआईसी के मुकाबले में एक नया इस्लामी संगठन बनाना था।
6. सऊदी अरब ने पाकिस्तान और उसके परमाणु कार्यक्रम और अर्थ व्यवस्था के लिए अरबों डॉलर खर्च किया है ताकि ईरान की ओर से किसी भी प्रकार के खतरे के समय वह पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से अपना बचाव कर सके लेकिस अरब देशों में इस्राईल से संबंध बनाने की जो होड़ शुरु हो गयी है उसके बाद सऊदी अरब को पाकिस्तान की ज़रूरत महसूस नहीं होती और उसे लगता है कि ईरान के खतरे से बचाने के लिए इस्राईल, पाकिस्तान से ज़्यादा बेहतर विकल्प है। विशेषकर इस लिए भी कि ईरान के प्रति दोनों की ही दुश्मनी एक जैसी है अर्थात इस्राईल और सऊदी अरब की।
इन सब बातों के मद्दे नज़र अब यह पक्की बात है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब तथा अन्य परशियन गल्फ के देशों के बीच एतिहासिक दोस्ती बंद गली में पहुंच चुकी है इस लिए अब पाकिस्तान की उनसे जुदाई पक्की है इसी के साथ वह पूरब में चीन और पश्चिम में ईरान, तुर्की जैसे देशों की ओर बढ़ेगा। इसी के साथ वह उनके घटकों जैसे क़तर, अंसारुल्लाह के यमन , हिज़्बुल्लाह के लेबनान और हश्दुश्शाबी के इराक़ से निकट होगा और इसी तरह हर उस देश से निकट होगा जो इस नये मोर्चे से जुड़ने का इच्छुक होगा जो सन 2021 में बेहद शक्तिशाली रूप में उभर कर सामने आने वाला है।

हम विश्व स्तर पर एक नये मोर्चे का गठन देख रहे हैं जिसकी कमान चीन और रूस के हाथ में होगा और जिसमें ईरान, तुर्की, पाकिस्तान और संभावित रूप से भारत भी शामिल होगा। यह मोर्चा, अमरीका में गृहयुद्ध और बिखराव की आशंका के बीच अधिक मज़बूत हो रहा है खास तौर पर उन रिपोर्टों के बाद जिनमें कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति ट्रम्प किसी भी दशा में वाइट हाउस से निकलने पर तैयार नहीं हैं और वह अपने नस्लभेदी समर्थकों को विद्रोह और हंगामों पर तैयार कर रहे हैं।
इन सब परिवर्तनों में अरब कहां हैं? उनमे से अधिकांश इस्राईल की कमान में बनने वाले मोर्चे में घुसने के लिए भाग रहे हैं क्योंकि कुछ अरब शासकों के यह लगता है कि इलाक़ा छोड़ कर भागने वाले अमरीका का विकल्प इस्राईल बन सकता है और वह उसे अंकल साम और अपना नया स्वामी बना सकते हैं ... लेकिन हमारी नज़र में यह बहुत घाटे का सौदा है और इन अरबों को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी।