समाचार एजेंसी तसनीम ने समाचार साइट ख़लीज ऑनलाइन के हवाले से रिपोर्ट दी है कि, पिछले कुछ महीनों के दौरान यह देखा गया है कि कुछ मुस्लिम अरब देशों ने अवैध ज़ायोनी शासन के साथ संबंधों को स्थापित किया है। रिपोर्ट के अनुसार यह राजनीतिक संबंध कोई नया विषय नहीं है बल्कि पिछले कई वर्षों से कुछ अरब देशों के इस्राईल के साथ ख़ुफ़िया संबंध रहे हैं। पहली बार वर्ष 1979 में मिस्र ने ज़ायोनी शासन के साथ आधिकारिक तौर पर राजनीतिक संबंध स्थापित किए थे। उसके बाद वर्ष 1994 में जॉर्डन ने भी मिस्र के पदचिन्हों पर चलते हुए इस्राईल से हाथ मिला लिया था। लेकिन इन दोनों देशों के ज़ायोनी शासन के साथ संबंध केवल राजनीतिक नहीं रहे, बल्कि इससे आगे बढ़कर इन्होंने इस्राईल के साथ आर्थिक, व्यापारिक, सामाजिक और खेल के क्षेत्र में भी अपने संबंध बना लिए। जबकि इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि धार्मिक प्रचारकों ने देश की आम जनमत की सोच को ज़ायोनी शासन के प्रति बदलने में प्रभावी भूमिका निभाई है। लेकिन मिस्र और जॉर्डन द्वारा इस्राईल के साथ स्थापित किए गए संबंधों को गुज़रे कुछ ही साल बीते थे कि वर्ष 2020 में एक बार फिर इस्राईल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए अरब देशों की एक लंबी लाइन लग गई है। इस बार लाइन में संयुक्त अरब इमारात, बहरैन और यहां तक कि दो अफ़्रीक़ी देश सूडान और मोरक्को भी शामिल हैं। ज़ायोनी शासन के साथ संबंध स्थापित करने में अचानक आई तेज़ी को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। इन सवालों में कुछ सवाल ऐसे भी हैं कि जिसमें पूछा जा रहा है कि, इस्राईल के साथ संबंध स्थापित करने के बीच इस्लामिक विद्वानों और धर्मगुरुओं का आम जनमत की सोच पर क्या असर ख़त्म हो गया है और अगर ऐसा नहीं है तो उनका कितना प्रभाव है और उसका क्या परिणाम होगा?
कुछ अरब देशों द्वारा इस्राईल के साथ स्थापित किए गए आधिकारिक तौर पर संबंधों की घोषणा के बाद उसके विरोध और उसकी आलोचना में कई तरह के फ़त्वे सामने आए थे। अवैध ज़ायोनी शासन के साथ संबंधों के सामान्यीकरण के ख़िलाफ़ दर्जनों या सैकड़ों धर्मगुरुओं और इस्लामिक प्रचारकों ने स्पष्ट रुख अपनाया है। इस्लामिक धर्मगुरुओं और विद्वानों द्वारा आयोजित की गई विभिन्न कान्फ्रेंस, जिसमें वर्ष 1968 में आयोजित हुए क़ाहिरा मक्का और अमान सम्मेलन, वर्ष 1968 में ही पाकिस्तान में आयोजित हुई अंतर्राष्ट्रीय कान्फ्रेंस और साथ ही वर्ष 1979 में अल-अज़हर विश्वविद्याल द्वारा जारी किया गया फ़त्वा, सबमें एक ही बात पर बल दिया गया था कि, इस्राईल के साथ किसी भी तरह के संबंधों को स्वीकार नहीं किया जाएगा और न ही यह संबंध धार्मिक दृष्टि से सही है। इसी तरह वर्ष 1989 में कुवैत में आयोजित हुई 19 मुस्लिम देशों की अंतर्राष्ट्रीय कान्फ्रेंस में धर्मगुरुओं ने यह फ़त्वा दिया था कि, फ़िलिस्तीन की एक टुकड़ा ज़मीन भी यहूदियों के बेचना वर्जित है। इसी तरह हाल कि दिनों में भी इस्लामिक जगत के बहुत सारे धर्मगुरुओं ने इस्राईल के साथ किसी भी तरह के संबंधों को स्थापित करने को वर्जित क़रार दिया है। 6 सितंबर वर्ष 2020 में ही दुनिया भर के 200 से अधिक धर्मगुरू और विद्वान सोशल मीडिया के माध्यम से एक साथ एकत्रित हुए और “यह संदेश मुस्लिम धर्मगुरुओं का है” के शीर्षक के तहत एक संयुक्त फ़त्वा जारी किया, जिसे वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ मुस्लिम स्कॉलर्स की वेबसाइट द्वारा प्रकाशित भी किया गया था।
फ़िलिस्तीन का मुद्दा एक ऐसा प्रमुख मुद्दा है जिसपर 70 वर्षों से अधिक समय से इस्लामी जगत के ध्यान को अपनी ओर खींच रखा है। क्योंकि फ़िलिस्तीन की धरती एक अरब इस्लामी धरती है। इसके अलावा मस्जिदे अक़्सा का वजूद, जो विश्व की तीसरी सबसे पवित्र मस्जिद है और मुसलमानों का पहला क़िब्ला भी है, फ़िलिस्तीन की धरती पर है जिसने उस धरती के महत्व को और ज़्यादा बढ़ा दिया है। इसलिए भी इस्लामिक धर्मगुरुओं ने एकमत होकर यह फ़त्वा दिया है कि इस्राईल के साथ किसी भी तरह के संबंध स्थापित करना जहां वर्जित है वहीं फ़िलिस्तीनी राष्ट्र और मुसलमानों के साथ सबसे बड़ी ग़द्दारी और विश्वासघात है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि जिस तेज़ी के साथ कुछ अरब देशों द्वारा इस्राइल के साथ संबंध सामान्य किए जा रहे हैं तो क्या इस्लामिक धर्मगुरुओं के फ़त्वों का उसपर कोई असर पड़ेगा और क्या वह काफ़ी होगा? एक वरिष्ठ इस्लामी प्रचारक “मुतीअ अलबातीन” का मानना है कि, ज़ायोनी शासन के साथ संबंध सामान्य किए जाने पर फ़त्वा और अपनी राय रखना इस्लामिक धर्मगुरुओं का कर्तव्य है और यह एक बहुत ही ज़रूरी काम है। एक अन्य धर्मगुरू का कहना था कि हम केवल फ़त्वा देकर ख़ामोश बैठने वाले नहीं है बल्कि हम इस साज़िशी संबंधों के नुक़सान के बारे में पूरी दुनिया के मुसलमानों को बताएंगे। उन्होंने कहा कि हम अपनी बात दुनिया के एक-एक मुसलमान तक पहुंचाने के लिए तैयारी भी कर रहे हैं। एक विश्वविद्याल के प्रोफेसर का कहना था कि, मुस्लिम धर्मगुरुओं का यह कर्तव्य बनता है कि वह हमेशा की तरह आगे आएं और इस साज़िशी समझौते से पर्दा उठाएं और दुनिया के सामने सच्चाई को पेश करें। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि मुस्लमि धर्मगुरु कभी भी अत्याचार और अत्याचारियों के आगे घुटने नहीं टेकते इसलिए वह इस मामले में भी अपने कर्तव्यों को निभाएंगे और आने वाले दिनों में उनके द्वारा दिए गए फ़त्वों का असर भी देखने को मिलेगा। (RZ)