जो बाइडन के कुछ सलाहाकर यहां तक कि खुद वह भी ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते में वापसी की बात करते हैं लकिन उसके लिए कुछ शर्तें पेश करते हैं, कुछ युरोपीय देशों ने भी उनके इस रुख का स्वागत किया है लेकिन सच्चाई यह है कि कानूनी लिहाज़ से अमरीका की परमाणु समझौते में वापसी, ईरान की शर्तों को पूरा किये जाने पर निर्भर है न किसी और की शर्तों को।
ईरान के साथ किया गया परमाणु समझौता कोई खाली घर नहीं है कि जब अमरीका का दिल चाहे घुस जाए और जब चाहे निकल जाए।
सब को पता है कि परमाणु समझौता के मुख्य दो पक्ष, ईरान और अमरीका थे जो ईरानियों और अमरीकियों के बीच लंबी वार्ता के बाद किया गया था। ईरान का प्रतिनिधित्व ईरानी विदेशमंत्री जवाद ज़रीफ और अमरीका का वहां के विदेशमंत्री जान कैरी कर रहे थे।
परमाणु समझौते के में उपस्थिति अन्य देश और युरोपीय संघ सब के सब परमाणु समझौते में दोनों पक्षों के वचनों के पालन की प्रक्रिया की निगरानी की ज़िम्मेदारी रखते थे और इसी के साथ ईरान ने परमाणु समझौते को सुरक्षा परिषद में पारित कराने की मांग की जिसकी वजह से सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव क्रमांक 2231 जारी किया लेकिन यह सारी तैयारियां भी, अमरीका को परमाणु समझौते पर प्रतिबद्ध नहीं बना सकीं और वह बाहर निकल गया इस लिए अब अमरीका की ओर से अधिक गारंटी दिये जाने की ज़रूरत है ताकि ईरानियों को विश्वास आए।

वास्तव में अमरीका ने परमाणु समझौते से निकल कर और सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव नंबर 2231 से निकल कर एक साथ कई कानूनों का उल्लघंन किया जिसके लिए उसे सज़ा मिलनी चाहिए न यह कि वह अब अपनी वापसी के लिए नयी नयी शर्तें पेश करे और नख़रे भी दिखाए।
परमाणु समझौते में अमरीका की वापसी का ईरान की नज़र में कोई महत्व नहीं है बल्कि उसकी वापसी से यही फर्क पड़ेगा कि अमरीका को ईरान पर अधिक दबाव डालने का एक अवसर मिल जाएगा और यही वजह है कि साफ महसूस हो रहा है कि ईरानियों को परमाणु समझौते में अमरीका की वापसी में फिलहाल कोई दिलचस्पी नहीं है।
ईरानियों के लिए जो चीज़ महत्वपूर्ण है वह यह है कि पहले बाइडन यह साबित करें कि बाइडन के दौर का अमरीका, बाइडन से पहले वाले अमरीका से अलग है और अमरीका अपनी पुरानी गलतियां नहीं दोहराएगा।
इसी तरह बाइडन को ईरानियों और पूरी दुनिया के सामने यह भी साबित करना होगा कि अमरीका एक भरोसा करने योग्य देश है और इसके साथ ही बाइडन अंतरराष्ट्रीय समझौते के प्रति अमरीका की खराब होने वाली छवि को सुधारेंगे।
इस तरह से यह कहा जा सकता है कि मिस्टर बाइडन का पहला क़दम यह होना चाहिए कि वह वाइट हाउस में प्रवेश और अपनी कुर्सी पर बैठने के पहले दिन सब से पहले अपनी सदभावना साबित करें और एक आदेश जारी करके, ट्रम्प के सभी आदेशों को खत्म करें और इसी तरह ईरान की जनता के खिलाफ लगाए गये प्रतिबंध खत्म करें, वह भी एक या दो महीने के लिए नहीं बल्कि सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के अनुसार, हमेशा के लिए। इसके लिए वह यह खेल भी नहीं खेल सकते कि इन प्रतिबंधों में से कुछ को कांग्रेस ने पारित किया है क्योंकि सब को यह मालूम है कि अमरीका का राष्ट्रपति एक आदेश द्वारा इन प्रतिबंधों को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर सकता है और उसके बाद प्रतिबंधों को खत्म करने का प्रस्ताव कांग्रेस में भेज सकता है इस लिए प्रतिबंधों के सिलसिले में किसी भी प्रकार का बहाना मतलब दुर्भावना का प्रदर्शन है।
इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि परमाणु समझौते को अमरीकी कांग्रेस पारित कर दे और उसे एक कानून बना दे ताकि अमरीका का कोई भी राष्ट्रपति उससे निकल न सके वर्ना बाइडन की वापसी से क्या फायदा अगर कुछ दिन बाद खुद वह या अगला राष्ट्रपति फिर उससे निकल जाए।
इसी तरह बाइडन के लिए यह भी ज़रूरी है कि वह दुनिया को फिर से विश्वास में लें कि अमरीका ईरान या किसी भी अन्य देश के साथ हुए समझौते या किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौत से बाहर नहीं निकलेगा और न ही अपने से पहले वाले राष्ट्रपति के वचनों को पैरों तले रौंद सकेगा।

इसके अलावा बाइडन को कुछ ऐसा भी करना होगा जिससे अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति के सारे उल्लंघनों और ईरान की जनता को पहुंचने वाले नुक़सान की कुछ भरपाई हो सके।
बाइडन अगर यह सब कर ले गये तो फिर संभव है कि ईरानी, परमाणु समझौते में अमरीका की वापसी स्वीकार कर लें, ज़ाहिर सी बात है ईरानी पहले भी साबित कर चुके हैं हर हाल में वह अपने वचनों का पालन करेंगे मगर उससे अधिक कुछ नहीं करेंगे।
यह सामने की बात है कि दुनिया का कोई भी देश यह स्वीकार नहीं करेगा कि किसी अन्य देश के साथ अपने रक्षा मामलों पर वार्ता करे और अगर अमरीकी क्षेत्रीय देशों को हथियार बेचना और ईरान को धमकी देना बंद कर दें तो शायद ईरानी भी रक्षा क्षेत्र में अधिक बजट लगाने से बचें अन्यथा जो सरकार भी अपने देश के रक्षा मामलों पर अन्य देशों से चर्चा करती है उसे देश के इतिहास में गद्दार ही कहा जाता है तो ज़ाहिर सी बात है ईरान की कोई सरकार इतिहास में अपना नाम इस तरह से दर्ज कराना पसंद नहीं करेगी।
इलाक़े में ईरान के प्रभाव के बारे में भी अमरीकियों को यह समझना पड़ेगाकि ईरान एतिहासिक रूप से इलाक़े में प्रभाव रखता है और रखेगा इस लिए यह संभव ही नहीं है कि क्षेत्र पर ईरान के प्रभाव को किसी समझौते या सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करके कम कर दिया जाए, आप कैसे लोगों से कह सकते हैं कि अमुक देश को पसंद करें अमुक देश को न पसंद करें?
इस लिए अगर बाइडन की सरकार सच में विवादों का निपटारा और मध्य पूर्व में तनाव कम करना चाहती है तो बेहतर है कि ईरान के रक्षा कार्यक्रम और क्षेत्र पर ईरान के प्रभाव का मुद्दा ही न उठाएं भले ही परमाणु वापसी के लिए ईरान की सभी शर्तों को मान लें क्योंकि यह अंसभव है कि ईरान इस मुद्दे पर पीछे हट जाए इस लिए इन मुद्दों को उठाने से जटिलता ही बढ़ेगी।
बाइडन मध्य पूर्व को बहुत अच्छी तरह पहचानते हैं अब अगर बाइडन भी अमरीका की प्रभावशाली लाबियों की ओर जारी नीति यानि ईरान को कमज़ोर करना और फिर उस पर क़ब्ज़ा करने की सपने में विश्वास रखेंगे तो फिर वह ईरान के रक्षा कार्यक्रम और क्षेत्र में ईरान के प्रभाव को मुद्दा उठा सकते हैं क्योंकि इन मुद्दों को उठाने के बाद ईरानी उनके बारे में यही राय बनाएंगे।