27 नवंबर 2020 - 18:03
भारत में किसानों और जवानों के बीच टकराव के लिए मुख्य ज़िम्मेदार कौन? अन्नदाताओं और उद्योगपतियों के बीच किसे चुनेगी मोदी सरकार?

पूरे भारत में तीन नए कृषि क़ानूनों को वापस लिए जाने की मांग को लेकर दिल्ली में प्रवेश करने की कोशिश में जुटे हरियाणा और पंजाब के किसानों को शुक्रवार को कामयाबी मिली। शुक्रवार सुबह से ही पुलिस किसानों को रोकने की कोशिश में जुटी हुई थी।

भारत में मोदी सरकार द्वारा बनाए गए विवादित कृषि क़ानून को लेकर पूरे देश के किसान इस समय सड़कों पर हैं। वहीं बहुत बड़ी संख्या में किसान भारत की राजधानी दिल्ली में दाखिल होने की कोशिश में शुक्रवार को भी जुटे रहे। हरियाणा और पंजाब के किसान राशन पानी के साथ विरोध प्रदर्शन के लिए अपने-अपने राज्यों से दिल्ली के लिए निकले हुए हैं। हालांकि दिल्ली पुलिस के मुताबिक़ कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के नियमों के अनुसार उन्हें दिल्ली में धरना प्रदर्शन की इजाज़त नहीं है। लेकिन शुक्रवार को किसानों के बढ़ते आक्रोश और उनके दृढ़ इरादों को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने उनके आगे हथियार डाल दिए और उन्हें दिल्ली में दाखिल होने की इजाज़त दे दी। इससे पहले हरियाणा के अंबाला में शंभू बॉर्डर के पास शुक्रवार को दोबारा पुलिस ने प्रदर्शनकारी किसानों पर पानी की बौछार कर उन्हें खदेड़ने की कोशिश की। दिल्ली-हरियाणा को जोड़ने वाले रास्ते पर पुलिस ने किसानों को रोकने के लिए कॉन्क्रीट के बोल्डर, कंटीले तार, भारी वाहन, जेसीबी मशीनों के साथ-साथ सड़कों पर बड़े-बड़े गढ्ढे खोद दिए ताकि किसान उसे पार न सकें, लेकिन किसानों को रोकने के सभी तरह के हथकंड़े धरे के धरे रह गए। गुरुवार को भी किसानों को रोकने के लिए इसी तरह के इंतज़ाम किए गए थे। शुक्रवार को किसान आर-पार के मूड में नज़र आए और उनका ग़ुस्सा सड़कों पर दिखा। किसानों को रोकने के लिए लगाए गए ट्रक को उन्होंने अपने ट्रैक्टर से हटाने की कोशिश की। किसानों पर पानी की बौछारें, आंसू गैस के गोले दाग़ने और किसानों द्वारा बैरिकेड्स को हटाने की नाटकीय तस्वीरें सामने आईं।

प्रदर्शनकारी किसानों का कहना है कि वह दिल्ली जाएंगे और मोदी सरकार से नए क़ानूनों को वापस लेने को कहेंगे। दरअसल किसान कई महीनों से तीन नए कृषि क़ानून का विरोध कर रहे हैं। एक न्यूज़ चैनल से बात करते हुए किसान ने कहा, "हम किसान हैं, हम खेत के कांटों के बीच बड़े हुए हैं। कांटेदार तारों से हमें डर नहीं लगता है।" एक और किसान ने कहा, "इसके लिए तो हम मेक्सिको बॉर्डर भी पार कर जाएंगे, दिल्ली का बॉर्डर क्या है।" प्रदर्शनकारी किसानों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण तरीक़ों से अपनी मांग रख रहे हैं। एक और किसान का कहना था, "हम जो भी कर रहे हैं वह शांतिपूर्ण तरीक़े से है। अगर हमें एक महीने के लिए भी रहना पड़ता है तो हम रहेंगे। अगर हमें शहीद होना पड़ता है तो हम शहीद होने को भी तैयार हैं।" पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह तत्काल किसान संगठनों से बातचीत कर गतिरोध को ख़त्म करे। दूसरी ओर कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से एक वीडियो साझा किया गया है जिसमें पुलिस को आंसू गैस के गोले दाग़ते दिखाया जा रहा है। कांग्रेस ने अपने ट्वीट में लिखा, "बीजेपी  सरकार अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ रही है। क्यों? क्योंकि उन्होंने अत्याचार के ख़िलाफ़ खड़े होने की हिम्मत दिखाई।" स्वराज इंडिया ने भी ट्वीट कर किसानों पर आंसू गैस के गोले छोड़ने की आलोचना की है। उसने अपने ट्वीट में लिखा, "जो किसान पूरे देश का पेट भरता है आज उसी किसान को अपनी बात कहने राजधानी आने तक की अनुमति नहीं है। सरकार देश के अन्नदाता को रोकने के लिए दमन का सहारा ले रही है। हरियाणा के सिंघु बॉर्डर पर पुलिस ने भारी मात्रा में आंसू गैस का इस्तेमाल किया।"

गुरुवार और शुक्रवार के हांगामे के बाद मोदी सरकार के केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि सरकार किसानों के साथ बातचीत करके उनके मुद्दों पर विचार विमर्श के लिए तैयार है। उनका कहना है कि नए क़ानून बनाना समय की आवश्यकता थी, आने वाले कल में यह नए कृषि क़ानून, किसानों के जीवन स्तर में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले हैं। तोमर के मुताबिक़, "नए कृषि क़ानूनों के प्रति भ्रम को दूर करने के लिए मैं सभी किसान भाइयों और बहनों को चर्चा के लिए आमंत्रित करता हूं।" इस बीच शुक्रवार को ही दिल्ली पुलिस ने दिल्ली सरकार से नौ स्टेडियमों को अस्थायी जेलों में तब्दील करने की अनुमति मांगी थी, जो ख़ारिज कर दी गई। दिल्ली सरकार का कहना है कि उसने किसानों की जायज़ मांगों को देखते हुए, दिल्ली पुलिस की स्टेडियम को जेल बनाने की अर्जी नामंज़ूर कर दी है। दिल्ली सरकार का कहना है कि किसानों का आंदोलन अहिंसक है और उन्हें जेल में डालना इसका समाधान नहीं है। दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार को किसानों की सभी मांगों को तुरंत मान लेने के लिए कहा है। किसानों के पीछे नहीं हटने के बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें बुराड़ी के निरंकारी समागम स्थल तक आने की इजाज़त दे दी। किसान अब निरंकारी समागम स्थल पर प्रदर्शन कर पाएंगे।

वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी पंजाब और हरियाणा के किसानों के समर्थन में किसान सड़कों पर उतर आए हैं और उन्होंने शुक्रवार को विरोध प्रदर्शन किया। एक दिन पहले ही भारतीय किसान यूनियन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चक्का जाम का ऐलान किया था। मथुरा में किसानों ने यमुना एक्सप्रेसवे पर विरोध करने के लिए सड़क जाम कर दिया। दिल्ली-देहरादून हाईवे पर भी किसानों ने चक्काजाम किया। अन्य राज्यों से दिल्ली आने वाले लोगों को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि पुलिस ने जगह-जगह बैरिकेडिंग की है। किसान नए कृषि क़ानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि नए क़ानून से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी। इसी की वजह से उन्होंने "दिल्ली चलो" का नारा दिया और राजधानी में विरोध प्रदर्शन का कार्यक्रम बनाया।

इस बीच जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार द्वारा बनाया गया नया कृषि क़ानून जहां किसानों को नुक़सान पहुंचाने वाला है वहीं इस क़ानून से जो सबसे ज़्यादा लाभान्वित होंगे वह हैं भारत के उद्योगपति और यही कारण है कि मोदी सरकार इस क़ानून को वापस लेने के बिल्कुल मूड़ में नहीं है और न ही वह इस क़ानून को वापस लेगी। जानकारों के अनुसार, किसानों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए यह ज़रूर कहा जा सकता है कि इस क़ानून में कुछ फेर बदल मोदी सरकार इशारा दे, लेकिन वह बदलाव होते भी हैं कि नहीं इसके बारे में यक़ीनी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है। याद रहे कि वर्ष 2014 से जब से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दिल्ली में एनडीए की सरकार आई है तब से वह लगातार हर क्षेत्र में बदलाव कर रही है, उसके बदलाव का ज़्यादातर हिस्सा भारत के उद्योगपतियों के पक्ष में जाता है। अब आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि मोदी सरकार देश के अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों की बात को सुनेगी कि एक बार फिर भारत के उद्योगपतियों की जीत होगी।