15 नवंबर 2020 - 13:08
सऊदी व इमाराती युवराजों की ओर से ज़ायोनियों के समर्थन का कच्चा-चिट्ठा, इमरान ख़ान की ज़बानी

फ़िलिस्तीनी काॅज़ से विश्वासघात और फ़िलिस्तीन पर अवैध क़ब्ज़ा करने वालों से संबंध स्थापित करने के लिए अरब देशों को तैयार करने में बिन सलमान व बिन ज़ायद की अहम भूमिका, वह सेवा है जो सिर्फ़ ट्रम्प के चुनावी हितों के परिप्रेक्ष्य में की गई है।

ज़ायोनी शासन को निःशुल्क सेवा प्रदान करने में सऊदी अरब व संयुक्त अरब इमारात के युवराजों की शर्मनाक भूमिका की सच्चाई, सभी की कल्पना और अपेक्षा के परे थी और उनकी यह सेवा, समीक्षकों की नज़रों से ओझल नहीं रह सकी बल्कि खुल्लम खुल्ला की गई लेकिन यही बात जब दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देशों में से एक के प्रमुख की ओर से सामने आती है तो इस पर विचार करना ज़रूरी हो जाता है।

 

आज यह बात सबके लिए स्पष्ट है कि सऊदी अरब व संयुक्त अरब इमारात, मुस्लिम व अरब देशों में हितों की पूर्ति के लिए पूंजी निवेश नहीं कर रहे हैं बल्कि वे उनकी नीतियों पर अधिक से अधिक प्रभाव डालने के लिए यह काम कर रहे हैं। यह, वास्तव में अमरीका व ज़ायोनी शासन के हितों की पूर्ति की ही नीति है जिसे यह दोनों अरब देश लागू कर रहे हैं। इस चीज़ को ज़ायोनी शासन से संबंध स्थापित करने के लिए सूडान जनता के विरोध के बावजूद इन दोनों देशों की ओर से सूडान पर डाले गए दबाव में सभी ने अच्छी तरह देख लिया है।

 

यह ऐसी शर्मनाक सच्चाई है जिसका पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस्लामाबाद में पर्दा फ़ाश किया। उन्होंने कहा कि मित्र देश, इस्लामाबाद पर दबाव डाल रहे हैं कि वह इस्राईली सरकार से संबंध स्थापित कर ले। ऐसा लग रहा था कि इमरान ख़ान उनके देश पर इस संबंध में डाले जाने वाले अत्यधिक दबाव से नाराज़ थे। उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि कुछ बातें व समस्याएं हैं जो उन देशों से संबंधित होती हैं जिन्होंने इस्राईल के अस्तित्व को औपचारिकता प्रदान की है, हम इन बातों को मैत्रिपूर्ण नहीं समझते लेकिन अपमान भी नहीं करेंगे।

 

इमरान ख़ान ने किसी भी देश का नाम नहीं लिया लेकिन जो चीज़ सभी के लिए पूरी तरह से स्पष्ट है वह यह है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब से बहुत अधिक आर्थिक सहायता हासिल करता है और इसी तरह संयुक्त अरब इमारात ने पाकिस्तान में हवाई परिवहन, संचार, बैंकिंग, भवन निर्माण व तेल व गैस समेत बहुत से क्षेत्रों में बहुत अधिक पूंजी निवेश कर रखा है। इस समय इमारात की 26 बड़ी कंपनियां पाकिस्तान में काम कर रही हैं। दूसरी ओर इस्राईल से संबंध स्थापना के लिए यही दो देश मुख्य रूप से सक्रिय हैं और अन्य देशों को इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं, इस लिए यह बात पूरी तरह से स्पष्ट है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का इशारा इन्हीं देशों की तरफ़ था।

 

कुछ ही समय पहले इराक़ की सरकार ने एक बड़ा अच्छा फ़ैसला किया और देश के दक्षिण में पूंजी निवेश करने के सऊदी अरब के प्रस्ताव को रद्द कर दिया। यह काम इराक़ी जनता के भारी विरोध के बाद किया गया क्योंकि इराक़ी जनता अच्छी तरह जानती है कि इस तरह के पूंजी निवेश का नतीजा न केवल षड्यंत्रों और ज़ायोनी शासन के साथ संबंध स्थापित करने के रूप में सामने आता है बल्कि इससे धार्मिक मतभेद बढ़ते हैं और तकफ़ीरी व वहाबी विचारधाराएं इस देश के लोगों को आपस में लड़ा देती हैं जो सबके सब एक ही धर्म के मानने वाले हैं। इन सबका उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ ज़ायोनी शासन के हितों को पूरा करना और अमरीका की ख़तरनाक साज़िशों को लागू करना है। अगर किसी को भी इन बातों में ज़रा सा भी शक है तो वह इमरान ख़ान से पूछ सकता है!