भारत एक ऐसा देश हैं जहां हज़ारों तरह के त्योहार मनाए जाते हैं, वहां लोग कोरोना महामारी के बावजूद त्योहारों के दौरान बहुत कम सावधानी बरत रहे हैं। महीनों के लॉकडाउन के बाद इस बीच कई प्रतिबंधों को हटाया जा चुका है, लेकिन महामारी अभी तक ख़त्म नहीं हुई है। बल्कि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जिस तरह भारत में जीवन लगभग पूरी तरह सामान्य कर दिया गया है उससे आने वाले दिनों में कोरोना महामारी से बड़ी तबाही होने की अशंका को नहीं टाला जा सकता है। भारत में अब तक कोरोना महामारी से 85 लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं। अमेरिका के बाद भारत संक्रमण के मामले में दुनिया भर में दूसरे स्थान पर है और अब तक इसकी वजह से 1,26,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीच भारत में पिछले एक महीने में हर दिन होने वाले नए मामलों में गिरावट देखी जा रही है। हालांकि अभी भी औसतन हर दिन लगभग 50,000 नए मामले दर्ज किए जा रहे हैं। आठ महीने पहले पूरे भारत में लागू किए गए पहले लॉकडाउन के मुक़ाबले, अब लोगों के बीच कोरोना वायरस का डर कम होता नज़र आ रहा है। जानकारों का कहना है कि, "जब सख़्त लॉकडाउन था और जनता की आवाजाही पर रोक थी, तब लोग डरे हुए थे। उस समय भय व्यवहार को नियंत्रित करता था। अब ऐसा नहीं है।"

वहीं जानकारों का यह भी मानना है कि पूरी दुनिया में एक बार फिर से कोरोना महामारी ज़ोर पकड़ती जी रही है और आने वाले दिनों में भारत में भी कोविड-19 से संक्रमित लोगों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। वहीं भारत में कोरोना महामारी को लेकर इस देश के मोदी सरकार और विशेषकर बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें पर लगातार यह आरोप लग रहे हैं कि वह कोविड-19 की गाइडलाइन को लेकर भेदभावपूर्ण रवैया अपनाए हुए हैं। कभी-कभी कोरोना महामारी को लेकर इतनी सख़्ती कर दी जाती है कि धार्मिक कार्यक्रमों में कितने लोग भाग लेंगे और कार्यक्रम का आयोजन होगा भी कि नहीं यह सब केंद्र सरकार और राज्य सरकारें तय करने लगती हैं। लेकिन कभी ऐसा देखने को मिलता है कि धार्मिक कार्यक्रमों में हज़ारों लाखों की भीड़ एकत्रित हो जाती है और वहां किसी भी तरह की कोई पाबंदी देखने को नहीं मिलती है। जानकारों का मानना है कि इस भेदभावपूर्ण रवैये से जहां चुनाव में कुछ वोटों की संख्या में शायद वृद्धि हो जाए, लेकिन आने वाले दिनों में इसके घातक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

वहीं दूसरी ओर हाल ही में हुए एक अध्ययन के अनुसार भारतीयों के बीच कोरोना संक्रमित होने के मुक़ाबले में अर्थव्यवस्था और निजी आमदनी बड़ी चिंता का विषय है। इंफेक्शन विशेषज्ञ जैकब जॉन के अनुसार "भारत में अधिकतर लोग बीमार पड़ने की तुलना में खाना और दवाओं की उपलब्धता आवश्यक जैसी चीज़ों के बारे में अधिक चिंतित हैं।" इसका जो सबसे बड़ा कारण है वह केंद्र एवं राज्य सरकारों की लचर नीतियां हैं। इसकी अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि मोदी सरकार ने लॉकडाउन का तो अचानक से एलान कर दिया था लेकिन उससे पेश आने वाली परेशानियों के लिए किसी भी तरह की कोई तैयारी नहीं थी। वहीं सरकार द्वारा नियुक्त वैज्ञानिकों की एक टीम ने हाल ही में दावा किया है कि भारत में कोविड-19 अपने चरम पर पहुंच चुका है और अगले साल फरवरी तक चलेगा। वैज्ञानिक दल के अनुसार, भारत में रोजाना कोरोना वायरस के नए संक्रमण में गिरावट जारी रहेगी और फ़रवरी 2021 तक महामारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है। संक्रमितों की संख्या में गिरावट उसी समय तक जारी रह सकती है जब लोग कोविड-19 की गाइडलाइन का पालन करें और सरकार एवं राज्य सरकारें केवल लॉकडाउन का सहारा न लेकर सोशल डिस्टेंसिग के नियमों के मामले में ढील न होने दे।

इस बीच मेडिकल क्षेत्र के कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जिस तरह देखा जा रहा है कि त्योहारों और चुनावी रैलियों में जमकर भीढ़ एकत्रित हो रही है और यह भीड़ ऐसी है कि जो कोविड-19 की गाइडलाइन का किसी भी तरह पालन नहीं कर रही है। इस लापरवाही का परिणाम बहुत ही घातक साबित हो सकता है और आने वाले दिनों में भारत में कोरोना से संक्रमितों की संख्या में अचानक वृद्धि देखने को मिल सकती है। "दीवाली जो रोशनी का त्योहार है इस समय पूरे भारत में बड़ी धूम-धाम से मनाया जा रहा है और यह देखा जा रहा है कि लाखों की संख्या में लोग बाज़ारों और मॉलों में घूम रहे हैं। यह बीमारी बेहद संक्रामक है और हम सभी जानते हैं कि हम आने वाले कुछ महीनों में बीमारी में एक और उछाल देख सकते हैं, जैसा यूरोपीय व अन्य देशों में देखा जा रहा है। अगर केवल धार्मिक भेदभाव करके धार्मिक कार्यक्रमों और त्योहारों में छूट देकर कुछ सरकारें यह सोच रही हैं कि उनका इससे लाभ होने वाला है तो वे हो सकता है कुछ वोट इसके बदले में प्राप्त कर लें लेकिन वे मानवीय जान से खिलवाड़ करके एक ऐसा गुनाह कर रही हैं जिसको कभी माफ़ नहीं किया जा सकेगा।