11 नवंबर 2020 - 16:26
क्या आप दुनिया में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले व्यक्ति को जानते हैं? लोकतांत्रिक राजशाही की आड़ में तानाशाही करने वाले ख़लीफ़ा अब नहीं रहे

बहुत सारे संचार माध्यमों ने ख़लीफ़ा बिन सलमान को दुनिया के सबसे पुराने प्रधानमंत्री के तौर पर जानते हैं। इतने लंबे समय तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहना, बहरैन की असंवैानिक व्यवस्था की पोल खोलता है। ख़लीफ़ा बिन सलमान एक ऐसा तानाशाह माना जाता है जिसने लोकतांत्रिक शाही व्यवस्था का मखौटा लगाकर तानाशाही की है।

समाचार एजेंसी तसनीम की रिपोर्ट के मुताबिक़, बहरैनी मीडिया ने बुधवार को बहरैन के प्रधानमंत्री ख़लीफ़ा बिन सलमान के मरने की सूचना दी है। ख़लीफ़ा बिन सलमान बहरैन नरेश के चाचा थे और 24 नवंबर 1935 में बहरैन के अलमहरक़ इलाक़े में पैदा हुए थे। उन्होंने अपने आरंभिक शिक्षा बहरैन के बुज़र्गों से प्राप्त की थी और उसके बाद वह वर्ष 1957 में ब्रिटेन चले गए थे। ख़लीफ़ा बिन सलमान ने ब्रिटेन से लौटने के बाद अपने पिता के दरबार में अपनी गतिविधियां शुरू कीं और समय के साथ ही वह बहरैनी बादशाह के कार्यालय के प्रमुख बन गए। लेकिन वह ख़ुद अक्सर अनुपस्थित रहते थे और अपने कामकाज को एक ब्रिटिश नागरिक के हवाले कर दिया था। इस तरह शेख़ ख़लीफ़ा अगस्त 1958 से लेकर 1964 जुलाई महीने तक बहरैनी शासन के कार्यालय के प्रमुख रहे। साथ ही 1960 में उन्हें वित्त मंत्रालय का एक अतिरिक्त पद भी मिला। जबतक ब्रिटेन का बहरैन पर नियंत्रण रहा वह पूरी तरह उनके प्रभाव में रहे।

9 अगस्त, 1965 को, ख़लीफ़ा बिन सलमान को बहरैन के शरणार्थियों और उनकी समस्याओं के निपटारे के लिए बनी समिति का अध्यक्ष पद सौंपा गया। इस समिति का सबसे अहम काम यह था कि वह विदेशी लोगों को बहरैन की नागरिकता दे ताकि बहरैन में बड़ी संख्या में मौजूद शिया मुसलमानों के मुक़ाबले में अन्य समुदायों की संख्या को बढ़ाया जा सके। अंतः ख़लीफ़ा बिन सलमान वर्ष 1971 में बहरैन के प्रधानमंत्री का पद संभालते हैं। इस तरह लोकतंत्र के नाम पर बहरैन नरेश द्वारा अपनी मर्ज़ी की एक सरकार का गठन होता है। ख़लीफ़ा बिन सलमान बहरैन की आज़ादी के समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ ही घंटों बाद इस देश के प्रधानमंत्री के तौर पर नियुक्त कर दिए गए। 86 वर्षीय ख़लीफ़ा बिन सलमान बहरैन के इतिहास में ऐसे प्रधानमंत्री हैं कि जो इस देश की आज़ादी से लेकर अपनी अंतिम सांस तक बहरैन के प्रधानमंत्री के पद पर बने रहे। इसीलिए इनको दुनिया का सबसे पुराना प्रधानमंत्री कहा जाता है।

ख़लीफ़ा बिन सलमान 49 वर्षों तक बहरैन के प्रधानमंत्री के पद पर रहे। यह ऐसा विषय है जो स्वयं बहरैन की लोकतांत्रिक व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफ़ी है। बहरैन के संविधान के अनुसार, इस देश के नरेश को यह अधिकार है कि वह बहरैन के प्रधानमंत्री जिसको चाहे नियुक्त करे और जिसको चाहे हटा दे। इसी तरह इस देश की कैबिनेट भी बहरैन नरेश और प्रधानमंत्री के ही आदेश से बनती और हटाई जाती है। इसीलिए कहा माना जाता है कि बहरैन की सरकार का जो सिस्टम है वह एक परिवारिक सिस्टम है न कि कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था। हास्यस्पद बात यह है कि बहरैनी मीडिया हमेशा यह लिखती है कि बहरैनी की कैबिनेट के गठन में इस देश के नरेश अपनी राय भी पेश करेंगे। जबकि आजतक ऐसा कभी नहीं हुआ है कि बहरैन सरकार की कैबिनेट को लोकतांत्रिक तरीक़े से चुना गया हो।

ख़लीफ़ा बिन सलमान आले ख़लीफ़ा द्वारा बहरैन के शिया मुसलमानों, पत्रकारों और मानवाधिकार कर्यकर्ताओं पर किए जाने वाले अत्याचारों में उनके दाहिने हाथ थे। कुछ ही समय पहले “सलाम” नामक मानवाधिकार और लोकतंत्र के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन ने पत्रकारों पर होने वाले अत्याचारों को समाप्त करने के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर अपने ट्वीटर पेज पर लिखा था कि, बहरैन के सुरक्षाकर्मी विशेषकर इस देश का राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र पत्रकारों पर हो रहे अत्याचारों में पूरी तरह शामिल है। सलाम नामक संगठन ने ख़लीफ़ा बिन सलमान की एक वीडियो भी अपने ट्वीटर पेज पर जारी किया था। जिस वीडियो में देखा जा सकता है कि वर्ष 2013 में बहरैन के प्रधानमंत्री इस देश के एक अधिकारी मुबारक बिन हुवैल से मिलने उनके घर जाते हैं। वह बहरैन का वही अधिकारी है जिसपर बहुत सारे बहरैनी डॉक्टरों, पत्रकारों और मानवाधिकार संगठनों के कार्यक्रताओं पर अत्याचार करने और उन्हें यातनाएं देने का आरोप है। इसी तरह ख़लीफ़ा बिन सलमान ने वर्ष 1990 में होने वाले प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोली चलाने का आदेश भी दिया था, जिसमें दर्जनों लोग हताहत और घायल हुए थे। इसी तरह ख़लीफ़ा बिन सलमान ने एक साथ 40 बेगुनाह बहरैनी नागरिकों की हत्या का भी आदेश दिया था और साथ ही न जाने कितने लोगों को उनके आदेश पर जेलों में वर्षों रखा गया और उन्हें यातनाएं दी गईं। कुलमिलाकर बहरैन में एक ऐसे सबसे पुराने अलोकतांत्रिक तरीक़े से प्रधानमंत्री के पद पर बैठे तानाशाह का अंत हो गया है कि जिसका हाथ न केवल अपने देश के लोगों के ख़ून से रंगा हुआ था बल्कि फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के साथ ग़द्दारी करने और उनके बहते ख़ून से अपनी सत्ता के रंग को और रंगीन करने वाला व्यक्ति था।