1 नवंबर 2020 - 12:44
मैक्रां का इंटरव्यू उनके पीछे हटने की शुरुआत...पैग़म्बर का अनादर करने के विनाशकारी परिणामों को देखकर होश में आए फ़्रांसीसी राष्ट्रपति, मगर यह काफ़ी नहीं

अलजज़ीरा टीवी चैनल के साथ साक्षात्कार में फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां अब कह रहे हैं कि पैग़म्बर का अनादर करने वाले कार्टूनों के बारे में मुसलमानों की भावनाओं को वह समझते हैं मगर उनके बयान पर कड़ी और व्यापक प्रतिक्रिया की वजह यह है कि इस बारे में झूठ शामिल कर दिया गया और इसका ग़लत अर्थ निकाल लिया गया।

मैक्रां का यह बयान साफ़ ज़ाहिर करता है कि वह अपने स्टैंड से पीछे हटे हैं और इस्लामी देशों में फ़्रांसीसी उत्पादों का बहिष्कार शुरू हो जाने की गहरी पीड़ा ने पूरी फ़्रांसीसी सरकार को बेचैन कर दिया है। मगर स्टैंड से पीछे हट जाना ही काफ़ी नहीं है बल्कि मैक्रां को अपनी गुस्ताख़ी पर दुनिया के लगभग दो अरब मुसलमानों से माफ़ी हट जाना ही काफ़ी नहीं है बल्कि मैक्रां को अपनी गुस्ता्रसका ग़लत अर्थ निकाल  ल मांगनी चाहिए जिन्हें उन्होंने आहत किया है। माफ़ी मांग लेने में फ़्रांस का फ़ायदा है क्योंकि जो घाव मैक्रां ने लगाया है वह अभी भरा नहीं है।

समझदार शासक वह होता है जो बड़ी ज़िम्मेदारी से काम करता है, कुछ भी बोलने से पहले उसे तोलता है और अपने देश की सुरक्षा को ख़तरे या संकट में डालने वाली हर बात और हर काम से कोसों दूर रहता है। मगर मैक्रां तो इस तरह बयानबाज़ी करने लगे थे जैसे कोई माफ़िया करता है हालांकि आजकल कोरोना वायरस की महामारी का ज़माना है जिसके चलते फ़्रांस में रोज़ाना 50 हज़ार नए बीमार आ रहे हैं और अर्थ व्यवस्था को एक बार फिर बंद करना पड़ा है।

मैक्रां को अपने पड़ोसी देश बेल्जियम से सबक़ लेना चाहिए था जिसने उपद्रवी मैगज़ीन शार्ली हेब्दो द्वारा प्रकाशित किए गए पैग़म्बरे इस्लाम के अपमानजनक कार्टून छात्रों के सामने पेश करने वाले टीचर को नौकरी से निकाल दिया। या वह कैनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रोडो से कुछ सीखते जिन्होंने फ़ौरन बयान दिया कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की भी सीमा है और हम पश्चिम वासियों के लिए ज़रूरी है कि दूसरों के साथ सम्मान से पेश आएं और उनकी भावनाओं को आहत न करें। मगर मैक्रां की सत्ता की भूख ने उन्हें अंधा और बहरा कर दिया था। नतीजा यह निकला किया उन्होंने आंख बंद करके बयान दिए और फ़्रांस की अर्थ व्यवस्था को संकट में झोंक दिया। करने वाले टीचर को नौकरी से निकाला दिया। या वह कैनेडा के प्रधानमंत

मैक्रां के बयान का एक फ़ायदा तो ज़रूर हुआ कि पूरा इस्लामी जगत एक मोर्चे पर एकत्रित हो गया और लगभग दो अरब मुसलमान पैग़म्बर की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए मैदान में आ गए वह हर प्रकार का विभाजन और अंतर भूल गए। जब धार्मिक प्रतीकों की बात हो तो आम जनता इसी अंदाज़ से प्रतिक्रिया दिखाती है।

कुवैत की जनता फ़्रांसीसी उत्पादों के बहिष्कार में दूसरों से आगे रही और दूसरों के लिए नमूना बनी। यह मैक्रां ही नहीं सारे पश्चिमी नेताओं के लिए खुला संदेश है कि इस्लामी जगत की शांति व स्थिरता को निशाना बनाने वाली अपनी नीतियों पर पुनरविचार करें।

कुवैत के साथ फ़्रांस का सालाना 21 अरब डालर का व्यापार है और फ़ार्स खाड़ी के अन्य देशों को भी शामिल कर लें तो इस इलाक़े से फ़्रांस का सालाना 300 अरब डालर का व्यापार होता है। पूंजीवादी देशों के लिए जो चीज़ सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है वह व्यापारिक फ़ायदा ही है।

इस बीच हम यह भी कहना चाहेंगे कि विभिन्न गलियारों में यह चर्चा है कि नीस में आतंकी हमला करने वाले युवा की ब्रेन वाशिंग पश्चिमी इंटेलीजेन्स एजेंसियों ने ही की और उसे आतंकी हमले के लिए तैयार किया था। इसका सुबूत अमरीका की पूर्व विदेश मंत्री हिलैरी क्लिंटन के वह ईमेल हैं जो लीक हो गए थे और जिनमें बताया गया है कि किस तरह पश्चिमी इंटेलीजेन्स एजेंसियां मुस्लिम युवाओं की ब्रेन वाशिंग करके उन्हें आतंकी हमलों के लिए तैयार करती हैं।

आख़िर में हम यह कहेंगे कि मैक्रां ने अपने नस्लवादी बयान से इस्लामी जगत के साथ फ़्रांस के संबंधों को गहरा आघात पहुंचाया है और इस खाई को भरने में कई साल लग जाएंगे। इसे भरना है तो मैक्रां को सबसे पहले साफ़ साफ शब्दों में माफ़ी मांगनी चाहिए।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के लेखक व टीकाकार