मूसा बिन मुतवक्किल हसन बिन अली अल खज़्ज़ाज़ से रिवायत करते हैं
"سَمِعْتُ اَلرِّضَا عليه السلام يَقُولُ: إِنَّ مِمَّنْ يَتَّخِذُ مَوَدَّتَنَا أَهْلَ اَلْبَيْتِ لَمَنْ هُوَ أَشَدُّ لَعْنَةً عَلَى شِيعَتِنَا مِنَ اَلدَّجَّالِ؛ فَقُلْتُ لَهُ يَا اِبْنَ رَسُولِ اَللَّهِ بِمَا ذَا؟ قَالَ بِمُوَالاَةِ أَعْدَائِنَا وَمُعَادَاةِ أَوْلِيَائِنَا إِنَّهُ إِذَا كَانَ كَذَلِكَ، اِخْتَلَطَ اَلْحَقُّ بِالْبَاطِلِ وَاِشْتَبَهَ اَلْأَمْرُ فَلَمْ يُعْرَفْ مُؤْمِنٌ مِنْ مُنَافِقٍ؛
मैंने इमाम रज़ा अस को फरमाते हुए सुना " हमारी मोहब्बत और मवद्दत का दावा करने वालों में से कुछ लोगों का नुकसान हमारे शियों के लिए दज्जाल के नुक़सानात से भी बढ़कर है।
मैंने अर्ज़ किया : ऐ फ़रज़ंदे रसूल ! इसका क्या कारण है ?
आपने इरशाद फ़रमाया : क्योंकि वह हमारे दुश्मनों के दोस्त हैं और हमारे दोस्तों के दुश्मन। और जब ऐसा होता है तो हक़ और बातिल मिल जाता है और मामला संदिग्ध हो जाता है मोमिन और मुनाफ़िक़ की पहचान सख्त हो जाती है मुनाफ़िक़ों में मोमिन को पहचाना नहीं जाता ।
तशरीह ( व्याख्या) : जब शिया कहलाने वाले लोग अहले बैत अ.स. के दुश्मनों का दोस्त भी हो और अहले बैत के चाहने वालों का दुश्मन भी हो तो फ़ित्ना फैलता है और फ़ित्ने के दौरान हको बातिल की पहचान मुश्किल ही नहीं कुछ लोगों के लिए न मुमकिन हो जाती है।