28 मार्च 2024 - 10:12
माहे रमज़ान और उलमा की सीरत

माहे रमज़ान के बारे में आपके क़ुर्आन से इश्क़ और मोहब्बत को आप ही के साथ रहने वाले नक़्ल करते हैं कि आप माहे रमज़ान में अपनी सारी इबादतों, नमाज़ों और दुआ के अलावा रोज़ाना 10 पारे क़ुर्आन के पढ़ते थे यानी हर तीन दिनों में एक पूरे क़ुर्आन की तिलावत करते थे

अल्लामा तबातबाई र.ह.

अल्लामा तबातबाई र.ह. नफ़्स की पाकीज़गी और इरफ़ान की उस ऊंचाई पर थे कि उनका शुमार आरिफ़ों और बहुत ज़्यादा मुनाजात करने वालों में होता है, उनके इरफ़ान की झलक को उनकी तफ़सीर अल-मीज़ान में देखा जा सकता है।

उनके साथ रहने वालों ने उनके बारे में कई बातें ऐसी ज़िक्र की हैं जिसको पढ़ने के बाद उनकी अज़मत और अल्लाह से नज़दीकी और ज़्यादा समझ में आती है, जैसाकि उनके शागिर्द द्वारा बयान किया गया है कि उनको रास्ता चलते भी अगर देखा तब भी उनकी ज़बान पर अल्लाह का ज़िक्र होता था, उनके दर्स में जब भी दर्स के बीच थोड़े समय के लिए भी उन्हें मौक़ा मिलता तो वह तुरंत मुसतहब नमाज़ों में मसरूफ़ हो जाते थे यहां तक कि रास्ता चलते उन्हें लोगों ने मुसतहब नमाज़ पढ़ते हुए देखा है, माहे रमज़ान की पूरी पूरी रात वह जाग कर गुज़ारते, और रात के थोड़े हिस्से में वह किताबें पढ़ते थे और बाक़ी पूरी रात क़ुर्आन की तिलावत, दुआ, ज़िक्र और नमाज़ पढ़ते थे।

आम दिनों में आप क़ुम शहर में हफ़्ते में कम से कम एक बार हज़रत मासूमा स.अ. के हरम में ज़ियारत के लिए जाते थे, लेकिन अल्लामा शहीद मुतह्हरी र.ह. के बयान के मुताबिक़ माहे रमज़ान में आप रोज़ाना हज़रत मासूमा स.अ. के रौज़े पर जाते थे और आप का इफ़्तार ही हज़रत मासूमा स.अ. की ज़रीह को बोसा देना था, वह पहले पैदल रौज़े पर आकर ज़रीह को चूमते थे फिर नमाज़ पढ़ कर घर जाकर कुछ खाते पीते थे, शहीद मुतह्हरी र.ह. कहते हैं उनकी इसी आदत ने मुझे उनका आशिक़ बना दिया था।

इमाम ख़ुमैनी र.ह.

इमाम ख़ुमैनी र.ह. की सीरत में एक बात जो बहुत अहम नज़र आती है वह क़ुर्आन की तिलावत है, आप दिन में सात बार अलग अलग समय में क़ुर्आन की तिलावत करते थे, यहां तक कि दस्तरख़ान पर जितनी देर में खाना लगता था उस थोड़े समय में भी आप क़ुर्आन की तिलावत करते थे।

आप नमाज़े शब के बाद से सुबह की नमाज़ तक क़ुर्आन की तिलावत करते थे, इमाम ख़ुमैनी र.ह. के किसी साथ रहने वाले का बयान है कि जब नजफ़ में आपकी आख़ों में कुछ तकलीफ़ हुई और डॉक्टर को दिखाया गया तो डॉक्टर ने चेकअप के बाद कहा कि आंखों पर बहुत ज़्यादा ज़ोर पड़ रहा है और जब किसी ने इमाम ख़ुमैनी र.ह. के क़ुर्आन पढ़ने के बारे में बताया तो डॉक्टर ने अगले कुछ दिनों तक क़ुर्आन न पढ़ने को कहा, जिस पर इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने डॉक्टर से कहा कि मैं आंखों का इलाज क़ुर्आन पढ़ने के लिए ही करवाने आया हूं, वरना ऐसी आंखों का क्या फ़ायदा कि जिसके होते हुए मैं क़ुर्आन ही न पढ़ सकूं, आप कुछ ऐसा कीजिए जिससे मैं क़ुर्आन पढ़ सकूं...।

माहे रमज़ान के बारे में आपके क़ुर्आन से इश्क़ और मोहब्बत को आप ही के साथ रहने वाले नक़्ल करते हैं कि आप माहे रमज़ान में अपनी सारी इबादतों, नमाज़ों और दुआ के अलावा रोज़ाना 10 पारे क़ुर्आन के पढ़ते थे यानी हर तीन दिनों में एक पूरे क़ुर्आन की तिलावत करते थे, और आप लोगों को रमज़ान से पहले कुछ मरहूमीन की तरफ़ से क़ुर्आन की तिलावत करने का हुक्म देते थे।

आयतुल्लाह बहजत र.ह.

आप शबे क़द्र के सारे आमाल और सारी दुआओं को पढ़ते थे, शबे क़द्र पूरी रात जाग कर इबादत करते और सर पर क़ुर्आन रख कर गिड़गिड़ा कर दुआ कर करते थे, हालांकि आपकी निगाह में क़ुर्आन सर पर रख कर दुआ करना केवल रमज़ान से मख़सूस नहीं है बल्कि आपका कहना था कि बहुत सारी इबादतों और आमाल के लिए किताबों में एक ख़ास समय दिया हुआ है जिसकी वजह से हम उन्हें केवल उसी समय में अंजाम देते हैं जिसकी वजह से वह उन दुआओं और आमाल के सवाब और असर से दूसरे दिनों में महरूम रह जाते हैं, इसीलिए आपकी नसीहत करते थे कि जब भी कोई मुश्किल समय आए तो माहे रमज़ान की तरह क़ुर्आन को सर पर रख कर दुआ करनी चाहिए, आप शबे जुमा और भी दूसरे अनेक मौक़ों पर इस अमल को अंजाम देते थे।

इसी तरह आप सोने से पहले हदीस किसा ज़रूर पढ़ते थे, और हमेशा बा वुज़ू हो कर लेटते थे, उम्र के आख़िरी पड़ाव में जब आप वुज़ू करने से मजबूर थे तो तयम्मुम कर के लेटते थे, कभी कभी रात को अचानक से उठ कर इबादत में मसरूफ़ हो जाते थे, आप कहते थे कि हज़रत ज़हरा स.अ. इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. को रात में जल्दी सुला देती थीं ताकि आधी रात से पहले ही उठ कर अल्लाह की इबादत कर सकें।

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