कुछ हदीसों में घर के अंदर तिलावत करने की फ़ज़ीलत बयान की गई है उसका राज़ क़ुर्आन की तबलीग़ और क़ुर्आन की तिलावत का ज़िक्र है क्योंकि जब इंसान अपने घर के अंदर क़ुर्आन की तिलावत करे तो उसकी बीवी बच्चे भी क़ुर्आन की तिलावत करते हैं उससे यह अमल लोगों के बीच बढ़ता रहता है, लेकिन अगर क़ुर्आन की तिलावत किसी ख़ास जगह पर अकेले की जाए तो उसका फ़ायदा उस शख़्स के अलावा दूसरा हासिल नहीं कर पाता और हर जगह यह फ़ज़ीलत केवल ख़ास बन कर रह जाती है।
शायद घरों में तिलावत की एक वजह यह भी हो कि इससे अल्लाह की निशानियां ज़िंदा रहती हैं क्योंकि जब सुबह शाम घरों से तिलावत की आवाज़ बुलंद होगी तो सुनने वालों की निगाह में इस्लाम की अहमियत बढ़ेगी इसलिए जब शहर के कोने कोने से क़ुर्आन की तिलावत की आवाज़ सुनाई देगी तो सुनने वालों पर एक तरह का दबदबा क़ायम रहेगा।
घरों में तिलावत का असर
वह घर जिसमें क़ुर्आन की तिलावत और अल्लाह का ज़िक्र किया जाता हो उसकी बरकतें बढ़ जाती हैं उसमें फ़रिश्ते नाज़िल होते हैं, शैतान उस घर को छोड़ देता है और वह घर जिसमें तिलावत होती है वह फरिश्तों को ऐसे रौशन और नूरानी दिखाई देते हैं जिस तरह आसमान के सितारे ज़मीन वालों को रौशनी देते हैं, और वह घर जिनमें तिलावत नहीं होती और अल्लाह का ज़िक्र नहीं होता उसमें बरकत कम होती है और फ़रिश्ते उसे छोड़ देते हैं और उनमें शैतानों का बसेरा हो जाता है।
हदीसों में क़ुर्आन की फ़ज़ीलत और वह सम्मान और इज़्ज़त जिसे अल्लाह तिलावत करने वाले को देता है इतना ज़्यादा ज़िक्र हुआ है कि इंसान की अक़्ल हैरत में पड़ जाती है....
पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं कि जिसने क़ुर्आन के केवल एक हर्फ़ की तिलावत की उसके आमालनामे में एक नेकी लिखी जाती है और हर नेकी का दस गुना सवाब मिलता है, फिर आपने फ़रमाया, मैं यह नहीं कहता कि अलिफ़ लाम मीम यह हर्फ़ है बल्कि अलिफ़ एक हर्फ़ है लाम दूसरा हर्फ़ है और मीम तीसरा हर्फ़ है।
इस हदीस को अहले सुन्नत रावियों ने भी नक़्ल किया है, जैसाकि क़ुरतुबी ने अपनी तफ़सीर में तिरमिज़ी से और उन्होंने इब्ने मसऊद से नक़्ल किया है, कुलैनी र.ह. ने भी लगभग इसी जैसी हदीस इमाम सादिक़ अ.स. से नक़्ल की है।
इसके अलावा और भी सैकड़ों हदीसें क़ुर्आन की तिलावत का सवाब बयान करती हैं, ध्यान रहे आज हमारे बीच तेज़ी से फैलने वाली बुराईयों की एक एहम वजह क़ुर्आन से दूरी है, हम भूल चुके हैं कि क़ुर्आन हमारे लिए ही नाज़िल हुआ है, उसके अहकाम उसकी हिदायत के नुस्ख़े हमारे लिए ही हैं, और अगर ऐसा ही रहा तो याद रहे कि यही क़ुर्आन क़यामत के दिन अल्लाह के सामने शिकायत करेगा और उस समय हमारे पास हाथ मलने के अलावा कोई चारा नहीं होगा।
क़ुर्आन की तालीमात पर अमल न करने का ही नतीजा है जिसके चलते आज मुसलमानों के किरदार और रवैये पर दूसरे लोग उंगली उठाते हैं, जबकि इंसान को इंसान बनाने का क़ुर्आन से मज़बूत नुस्ख़ा किसी दीन के पास नहीं है, इसलिए याद रखिए जिस तरह क़ुर्आन की शफ़ाअत अल्लाह की बारगाह में क़ुबूल है उसी तरह उसकी शिकायत पर भी अल्लाह माफ़ करने वाला नहीं है।