19 मार्च 2024 - 10:46
क़ुर्आन की तिलावत की फ़ज़ीलत और उसका सवाब

क़ुर्आन की तिलावत ज़रूर किया करो इसलिए कि क़ुर्आन की आयतों की तिलवात के हिसाब से ही जन्नत में दर्जे दिए जाएंगे, जब क़यामत का दिन होगा और क़ुर्आन की तिलावत करने वाले से कहा जाएगा कि क़ुर्आन पढ़ते जाओ और अपने दरजात बुलंद करते जाओ फिर वह जैसे जैसे क़ुर्आन की तिलावत करेगा उसके दरजात बुलंद होते जाएंगे।

क़ुर्आन वह आसमानी क़ानून है जो लोगों की दुनिया और आख़ेरत में सआदत और कामयाबी की ज़िम्मेदारी लेता है, क़ुर्आन की हर आयत हिदायत का स्रोत और अल्लाह की रहमत की खान है, जो भी हमेशा बाक़ी रहने वाली सआदत और दीन और दुनिया की कामयाबी की आरज़ू रखता है उसे दिन रात क़ुर्आन से अहद कर लेना चाहिए, उसकी आयतों को अपने दिमाग़ में बसा ले और उन्हें अपनी फ़िक्र और विचारों में शामिल कर ले ताकि हमेशा की कामयाबी और कभी ख़त्म न होने वाले व्यापार की तरफ़ क़दम बढ़ा सके।

क़ुर्आन की तिलावत की फ़ज़ीलत और उसके सवाब के सिलसिले में पैग़म्बर स.अ. और मासूमीन अ.स. से बहुत सारी हदीसें नक़्ल हुई हैं, जैसाकि एक हदीस में इमाम बाक़िर अ.स. फ़रमाते हैं कि पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया, जो शख़्स रात में दस आयतों की तिलावत करे उसका नाम ग़ाफ़िलों (जो अल्लाह की याद से दूर हो जाते हैं) में नहीं लिखा जाएगा और जो शख़्स पचास आयतों की तिलावत करे उसका नाम ज़ाकेरीन (अल्लाह का ज़िक्र करने वालों और हराम व हलाल का ख़्याल रखने वालों) में लिखा जाएगा और जो शख़्स सौ आयतों की तिलावत करे उसका नाम क़ानेतीन (इबादत करने वालों) में लिखा जाएगा और जो शख़्स दो सौ आयतों की तिलावत करे उसका नाम ख़ाशेईन (अल्लाह के सामने ख़ुज़ूअ (विनम्रता) से पेश आने वालों) में लिखा जाएगा और जो शख़्स तीन सौ आयतों की तिलावत करे उसका नाम सआदत हासिल करने वालों में लिखा जाएगा और जो शख़्स पांच सौ आयतों की तिलावत करे उसका नाम हर समय अल्लाह की इबादत की कोशिश में रहने वालों में लिखा जाएगा और जो शख़्स हज़ार आयतों की तिलावत करे वह ऐसा हो जैसे उसने बहुत बड़ी तादाद में सोना अल्लाह की राह में दे दिया हो।

इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं क़ुर्आन अल्लाह की तरफ़ से एक अहद है, मुसलमान को अपने अहदनामे Testament को ध्यान से पढ़ना चाहिए और रोज़ाना पचास आयतों की तिलावत करनी चाहिए।

आपने यह भी फ़रमाया कि जब तुम्हारे व्यापारी व्यापार से निपट कर घर वापस आते हैं तो सोने से पहले एक सूरे की तिलावत करने से उन्हें कौन सी चीज़ रोक देती है... (यानी वह क्यों तिलावत नहीं करते), ताकि हर आयत के बदले उसके लिए दस नेकियां लिखा जाएं और उसके आमालनामे से दस बुराईयां मिटाई जाएं।

फिर आप फ़रमाते हैं कि क़ुर्आन की तिलावत ज़रूर किया करो इसलिए कि क़ुर्आन की आयतों की तिलवात के हिसाब से ही जन्नत में दर्जे दिए जाएंगे, जब क़यामत का दिन होगा और क़ुर्आन की तिलावत करने वाले से कहा जाएगा कि क़ुर्आन पढ़ते जाओ और अपने दरजात बुलंद करते जाओ फिर वह जैसे जैसे क़ुर्आन की तिलावत करेगा उसके दरजात बुलंद होते जाएंगे।

हदीस की किताबों में उलमा ने इस विषय पर बहुत सी हदीसें जमा की हैं और बिहारुल अनवार की उन्नीसवीं जिल्द में इस विषय पर बहुत हदीसें मौजूद हैं उनमें से कुछ हदीसों के मुताबिक़ क़ुर्आन देख कर तिलावत करना ज़ुबानी तिलावत करने से बेहतर है।

उनमें से एक हदीस यह है कि इसहाक़ इब्ने अम्मार ने इमाम सादिक़ अ.स. से कहा कि मेरी जान आप पर क़ुर्बान हो मैंने क़ुर्आन हिफ़्ज़ कर लिया है और अब ज़ुबानी ही तिलावत करता हूं, यही बेहतर है या क़ुर्आन देख कर तिलावत करूं....., आपने फ़रमाया, क़ुर्आन देख कर तिलावत करना बेहतर है, क्या तुम्हें नहीं मालूम कि क़ुर्आन की तरफ़ देखना इबादत है, जो शख़्स क़ुर्आन में देख कर तिलावत करे उसकी आंख ख़ुशी का एहसास करती है और उसके वालेदैन के अज़ाब में कमी कर दी जाती है चाहे वह काफ़िर क्यों न हों।

** क़ुर्आन में देख कर तिलावत करने की ताकीद के लिए कुछ बातों की तरफ़ ध्यान ज़रूरी है, क़ुर्आन में देख कर तिलावत करने की ताकीद इसलिए की है ताकि ऐसा न हो कि क़ुर्आन की तिलावत हिफ़्ज़ से करने की वजह से क़ुर्आन को धीरे धीरे किनारे कर दिया जाए और उसमें तहरीफ़ हो जाए या उसको लोगों के बीच से ग़ायब ही कर दिया जाए।

** दूसरी वजह यह है कि क़ुर्आन में देख कर तिलावत करने के बहुत से असर हैं जिनको हदीसों में बयान किया गया है, जैसाकि इमाम अ.स. ने फ़रमाया देख कर क़ुर्आन पढ़ने वाले की आंखें अंधेपन और आंखों की बीमारी से महफ़ूज़ रहती हैं या यह कि देख कर क़ुर्आन की तिलावत करने से बहुत सारे क़ुर्आनी राज़ का इल्म इंसान को हासिल होता है, क्योंकि इंसान की निगाह जब किसी ऐसी चीज़ पर पड़ती है जिसे वह पसंद करता हो तो उसका नफ़्स ख़ुश होता है और वह अपनी आंखों और बसीरत में रौशनी महसूस करता है, क़ुर्आन में लिखे लफ़्ज़ पर जब तिलावत करने वाले की निगाह पड़ती है और वह उसके मानी और मतलब पर ध्यान देता है तो वह अपने अंदर इल्म और जागरुकता को महसूस करता है और उसकी रूह सुकून का एहसास करती है।