यह काम जिसे हम अज़ादारी कहते हैं, हो सकता है कि कुछ लोगों की निगाह में इसकी कोई ख़ास अहमियत न हो या मअमूली हैसियत हो, लेकिन अहलेबैत अ. की निगाह में यह एक बहुत महान और सवाब का काम है और हमारी एक ज़िम्मेदारी यह है कि अहलेबैत अ. ने जो तरीक़ा और उसूल बताए हैं, उनके हिसाब से अज़ादारी करें।
इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के सहाबी फ़ुज़ैल आपके पास आते हैं और आपसे बात करने लगते हैं। इमाम ने उनसे पूछा:
اَتَجلِسونَ وَ تُحَدِّثونَ
क्या तुम लोग यानि हमारे चाहने वाले और हमारे शिया, एक दूसरे के साथ बैठते हो, इकट्ठा होते हो और एक दूसरे से बातचीत करते हो? उन्होंने जवाब दिया
’’نَعَم !جَعلتُ فَدَاکَ‘‘
हाँ मौला! हम ऐसा करते हैं। तब इमाम फ़रमाते हैं:
’’تِلکَ المَجَالِس اُحِبُّهَا‘‘
मैं इस तरह कि मजलिसों और महफ़िलों को बहुत पसंद करता हूं जिनमें हमारे शिया एक साथ मिलजुल कर बैठते हैं। इसके बाद इमाम एक इम्पॉर्टेंट प्वाइंट की तरफ़ इशारा करते हैं जिससे यह समझ में आता है कि जब भी अहलेबैत (अ.स.) के चाहने वाले एक साथ बैठें, एक-दूसरे से बातचीत करें और एक जगह इकट्ठा हों, तो वह दुनियावी मक़सद के लिए या बिना किसी मक़सद के न हो बल्कि मक़सद अल्लाह और अहलेबैत का ज़िक्र होना चाहिए। इसलिए इमाम फ़रमाते हैं:
’’رِحِمَ اللهُ عِبداً اَحْیَا اَمرَنَا فَاَحیُوا اَمرَنَا‘‘
अल्लाह उन लोगों पर रहम करे जो हमारे अम्र (शिक्षा) को ज़िंदा रखते हैं। तुम इन मजलिसों से हमारे अम्र को ज़िंदा करो।
हालाँकि, यहाँ मजलिस से मुराद सिर्फ़ अज़ादारी नहीं है, इसमें बल्कि अहलेबैत के शियों की हर बैठक और सभा शामिल है अगरचे अज़ादारी की अहमियत दूसरे जलसों से बुहत ज़्यादा है। इसलिए अहलेबैत (अ) की निगाह में, इन मजलिसों, महफ़िलों और अज़ादारी का मक़सद अहलेबैत (अ) के अम्र (शिक्षा) को ज़िंदा करना है।
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की एक और हदीस है जिसमें उन्होंने अपने साथियों से कहा:
’’تَزاوَروا وَ تَلاقُوا وَ تَذاکرُوا وَ احیَوا اَمرَنا ‘‘
एक-दूसरे से मुलाक़ात करो, एक-दूसरे से मिलो जुलो, एक-दूसरे को हमारे अम्र की याद दिलाओ और उसे ज़िंदा करो।