ईरान की नौसेना के समुद्री बेड़े ने जिसमें देना डिस्ट्रायर और मकरान युद्धपोत शामिल थे 213 दिन में पूरी दुनिया का समुद्री चक्कर लगाया। इस ग्रुप ने 20 सितम्बर 2022 को अपनी यात्रा शुरू की और प्रशांत सागर को पार करते हुए लैटिन अमेरिका तक गया औज्ञ उसके बाद एटलांटिक महासागर से गुज़र कर ओमान के सलाला बंदरगाह पर लंगरअंदाज़ हुआ है।
समूद्री क्षेत्र में इस्लामी गणतंत्र ईरान की इस सफलता की चर्चा ईरान में ही नहीं बल्कि लैटिने अमेरिका में है। लैटिन अमेरिका में वेनेज़ोएला जैसे ईरान के घटक देशों में यह संदेश बड़ी मज़बूती से गया है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान अपने घटकों के लिए बड़ी ज़िम्मेदारी से काम करता है और भरोसेमंद सहयोगी है। रूस के अधिकारियों के बयान से भी यह संदेश साफ़ है कि एक रणनैतिक घटक के रूप में उन्हें इस्लामी गणराज्य ईरान पर भरपूर भरोसा है।
अगर पश्चिमी एशिया की बात की जाए तो इस इलाक़े के दशों ने भी बार बार ईरान और ईरान की मदद पर अपना भरोसा जताया है। इस्लामी गणतंत्र ईरान ने सीरिया की जिस तरह मदद की और जिस तरह उसे अंतर्राष्ट्रीय साज़िश की मुंह सब सुरक्षित निकाला वह पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश था। इस्लमी गणराज्य ईरान ने इराक़ की जिस तरह सहायता की और उसे दाइश के चंगुल से जिस तरह आज़ाद कराया वह भी एक बड़ा उदाहरण है।
यह सब कुछ उस दौर में हो रहा है जब अमरीका के रवैए के चलते उसके घटकों के बीच यह विचार मज़बूत हो रहा है कि अमरीका पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका की सैनिक उपस्थिति से कई देशों ने बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं यहां तक कि निवेश भी कर रखा था मगर जिस तरह अमरीका अफ़ग़ानिस्तान से निकला है उससे इन देशों को बड़ा धचका लगा। यही नहीं अमरीका के दूसरे घटकों में भी यह विचार आम हुआ कि अमरीका पर भरोसा करना अपने आप को धोखा देने के समान है।
हालिया समय में सऊदी अरब के रुख़ और नीतियों पर सारी दुनिया के राजनैतिक और प्रचारिक गलियारों की नज़र है और इसे भी इस बात का उदाहरण माना जा रहा है कि अमरीका के घटकों का भरोसा अमरीका से हट रहा है। सऊदी अरब पारंपरिक रूप से अमरीका का क़रीबी घटक समझा जाता था लेकिन अब जिस तरह उसने रूस और चीन के मसले में अपनी नीतियों में नए आयाम पैदा किए हैं उससे अमरीका सहित पूरी दुनिया में यह संदेश गया है कि सऊदी अरब भी अमरीका पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है।
इतना ही नहीं यूरोपीय देशों के अधिकारियों ख़ास तौर पर फ़्रांस के राष्ट्रपति मैक्रां के बयान को देखा जाए तो इससे भी यही संदेश मिलता है कि अमरीका पर दुनिया के देशों का भरोसा टूट रहा है।
रोचक बात यह है कि खुद अमरीका को इस सच्चाई का पूरी गंभीरता से एहसास नहीं है और जब एहसास होगा तब तक शायद देर हो चुकी होगी।
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