आले खलीफा की तानाशाही सरकार इस देश में होने वाले चुनावों से यह दिखाना चाहती है कि इस देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है जबकि विश्व जनमत अच्छी तरह जानता है कि बहरैन में तानाशाही सरकार है और यह सरकार जो चाहती है वही होता है। बहरैन के वरिष्ठतम शिया धर्मगुरू शैख ईसा क़ासिम ने डेमोक्रेसी और लोकतंत्र को ज़िन्दा रखने के लिए इन चुनावों का बहिष्कार किये जाने की मांग की है। अगर बहरैन की आले खलीफा सरकार जनता की इच्छाओं और उसकी मांगों का सम्मान करती तो फरवरी 2011 से चलने वाला जनांदोलन अब तक जारी न रहता। शांतिपूर्ण ढंग से होने वाले जनप्रदर्शनों को आले खलीफा की सरकार ने बड़ी निर्मता से कुचला और प्रदर्शनकारियों के दमन के लिए उसने सऊदी अरब की तानाशाही सरकार से मदद ली और सऊदी सैनिकों ने बहरैनी जनता के दमन में किसी प्रकार के संकोच से काम नहीं लिया।
रोचक बात यह है कि मानवाधिकार की रक्षा का दम भरने वाली सरकारों और देशों ने अर्थपूर्ण चुप्पी साधे रखा। वास्तव में मानवाधिकार की रक्षा का दम भरने वाले देशों का अर्थपूर्ण मौन बहरैन की तानाशाही सरकार का समर्थन है। अपनी मांगों को लेकर जो प्रदर्शन बहरैन में हुए हैं और इस देश की तानाशाही सरकार ने जिस तरह से इन प्रदर्शनों को कुचला है वह अपने आपमें अनउदाहरणीय है। जानकार हल्कों का मानना है कि चूंकि अमेरिका का पांचवां बेड़ा बहरैन की तानाशाही सरकार की सुरक्षा के लिए खड़ा है और बहरैन की आले खलीफा सरकार के अमेरिका और जायोनी शासन से अच्छे संबंध हैं इसलिए मानवाधिकार की रक्षा का दम भरने वालों ने अर्थपूर्ण चुप्पी साध रखी है और आले खलीफा की तानाशाही सरकार किसी प्रकार के संकोच के बिना मानवाधिकारों का हनन कर रही है और हज़ारों बहरैनी इस देश की जेलों में बंद हैं।
रोचक बात यह है कि आले खलीफा की सरकार ईरान पर अपने देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का निराधार आरोप मढ़ती है जबकि बहरैनी लोगों के दमन के लिए सऊदी अरब के सुरक्षा बलों को बुलाती है। दूसरे शब्दों में एक देश दूसरे देशों के लोगों के दमन के लिए अपने सुरक्षा बलों को बहरैन भेजता है तो आले खलीफा की सरकार इसे हस्तक्षेप नहीं कहती है परंतु ईरान किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करता है फिर भी उस पर हस्तक्षेप का आरोप लगाती है।
सवाल यह पैदा होता है कि बहरैन की तानाशाही सरकार इस प्रकार का निराधार दावा तेहरान के खिलाफ क्यों करती है? इसके जवाब में राजनीतिक टीकाकारों का कहना है कि न केवल आखे खलीफा की तानाशाही सरकार बल्कि विश्व जनमत भी बहुत अच्छी तरह जानता है कि मनामा सरकार क्या कर रही है? वह वास्तविकता से आम जनमत का ध्यान भटकाने के लिए तेहरान के खिलाफ निराधार दावे करती है। यही नहीं बहरैन की तानाशाही सरकार ने इस देश की गैर डेमोक्रेसी व गैर लोकतांत्रिक सरकार के खिफाफ प्रदर्शन करने वाले बहुत से लोगों की नागरिकता समाप्त करके बाहर निकाल दिया है यह वह ग़ैर कानूनी कार्य है जो आमतौर पर कोई सरकार नहीं करती है और इस पर मानवाधिकारों की रक्षा का दम भरने वाले देश पूरी तरह अर्थपूर्ण चुप्पी साधे हुए हैं। बहरैन के वरिष्ठतम शिया धर्मगुरू शैख ईसा कासिम के साथ इस देश की तानाशाही सरकार ने जो कुछ किया है उसे इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। MM
342/