वह दुनिया की एक मात्र राजनेत्री हैं जो नेत्री होने के साथ ही संगीतकार, साहित्यकार और चित्रकार भी हैं। ममता बनर्जी 87 किताबें लिख चुकी हैं और सैकड़ों गीतों की कवित्री और तीन सौ बेस्ट सेलर पेंटिंग्ज़ की चित्रकार हैं। यह भारत की पहली नेता हैं जिन्होंने अपनी सादा जीवन शैली से कम्युनिस्टों को शिकस्त दी। वह भारत में दीदी कहलाती हैं और दुनिया में कामयाब नेता की बहुत बड़ी केस स्टडी हैं। ममता बनर्जी के बैक गाउंड पर एक नज़र डाल लेते हैं।
ममता बनर्जी 1955 में कोलकाता में पैदा हुईं। पिता छोटे से राजनैतिक कार्यकर्ता थे और मां हाउस वाइफ़ थीं। ममता बनर्जी छह भाइयों की इकलौती बहन थीं। पिता का निधन हो गया। परिवार ब्रहमण था। छूतछात का पाबंद था। ममता बनर्जी कालेज पहुंचीं तो इस्लामी इतिहास से अवगत हुईं और धीरे धीरे इस्लामी शिक्षाओं में उतर गईं।
ममता बनर्जी के राजनैतिक सफ़र पर नज़र डाली जाए तो वह सतत उत्थान की लंबी दास्तान है।
ममता बनर्जी ने यह कमाल कैसे किया? इसका जवाब है उनकी सादगी, निष्ठा और साहस। वह दस साल से पश्चिमी बंगाल जैसे राज्य की मुख्यमंत्री हैं लेकिन चीफ़ मिनिस्टर हाउस में नहीं रहतीं बल्कि अपने दो कमरे के मकान में रहती हैं। घर में कोई नौकर नहीं है। वह तीन बार केन्द्रीय मंत्री रहीं इसलिए उनको 2 लाख रूपए की पेंशन मिलती हैं मगर उन्होंने आज तक यह पेंशन नहीं ली। उन्होंने आज तक चीफ़ मिनिस्टर की तनख़्वाह भी नहीं ली। अपना सारा ख़र्च अपनी जेब से उठाती हैं और चाय भी सरकारी नहीं पीतीं। सवाल यह है कि उनके पास पैसे फिर आते कहां से हैं? यह उनकी किताबों और कैसेटों की रायल्टी है। वह 87 किताबों की लेखिका हैं जिनमें कई किताबें बेस्ट सेलर हैं। उन्हें इस तरह सालाना पांच सात लाख रूपए मिल जाते हैं जिससे वह अपना पूरा ख़र्च चला लेती हैं। उनकी पेंटिंग्ज़ भी बिकती हैं मगर वह रक़म वह डोनेशन में दे देती हैं।
अपने रहन सहन से बेहद मामूली नज़र आने वाली इस महिला ने पश्चिमी बंगाल में कमाल कर दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ़्रास्ट्रक्चर, वूमन एम्पावरमेंट, रोज़गार, स्पोर्ट्स, सांप्रदायिक भाईचारा जैसे क्षेत्रों में नए उदाहरण स्थापित किए हैं। वह मुसलमानों को इस्लाम की बातें सिखाती हैं और हिंदुओं को गीता में से शांति का संदेश देती हैं। वह सब की दीदी हैं।
अगर हम ममता बनर्जी की सादगी का विशलेषण करेंगे तो सादगी की ताक़त के क़ायल हो जाएंगे।
रोज़नामा एक्सप्रेस में छपे जावेद चौधरी के लेख के कुछ अंश