सऊदी अरब के वर्तमान क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की ओर से यमन पर सैन्य हमले का आदेश जारी किए जाने को छः साल पूरे हो रहे हैं। सऊदी अरब ने 25 मार्च 2015 को अपने पिट्ठू और यमन के अपदस्थ राष्ट्रपति मंसूर हादी को सत्ता में पहुंचाने और अंसारुल्लाह संगठन को तबाह करने के उद्देश्य से यमन के ख़िलाफ़ सैन्य कार्यवाही शुरू की थी। सऊदी अधिकारियों ने वादा किया था कि कुछ ही हफ़्तों में या ज़्यादा से ज़्यादा तीन महीने में यह अभियान ख़त्म हो जाएगा और सऊदी गठबंधन अपने सभी लक्ष्य हासिल कर लेगा।
अब बिन सलमान द्वारा छेड़े गए युद्ध को छः साल पूरे होने को हैं और मोरोको, मिस्र, जाॅर्डन और सूडान के साथ मिल कर बनाया गया सऊदी अरब का यह गठजोड़, किराए के हज़ारों विदेशी सैनिकों और अमरीका, ब्रिटेन, फ़्रान्स और जर्मनी के अलावा दसियों पश्चिमी सरकारों की गुप्तचर सूचनाओं व हथियारों की मदद के बावजूद न सिर्फ़ यह कि अपने किसी भी लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका है बल्कि युद्ध के लम्बे खिंच जाने के कारण बिखराव की कगार पर पहुंच गया है। सऊदी अरब के सैन्य ठिकाने और तेल प्रतिष्ठान लगातार यमनी बलों के मीज़ाइलों व ड्रोनों का निशाना बन रहे हैं। यमनी बल सऊदी अरब के काफ़ी अंदर तक हमले कर रहे हैं जबकि जंग के मैदान में भी वे सऊदी गठबंधन के दांत खट्टे किए हुए हैं। इस समय मआरिब का रणनैतिक शहर यमनी बलों के कंट्रोल में आने ही वाला है।
यमनी राष्ट्र की यह सैनिक व राजनैतिक विजय ऐसी स्थिति में है कि जब सऊदी गठबंध ने जल, थल और हवा से यमन का पूरी तरह से घेराव कर रखा है लेकिन यमनी राष्ट्र अपने संकल्प के बल पर सऊदी गठजोड़ को लगातार पराजित करता जा रहा है और यमनी जनता को भूखा मार देने की सऊदी अरब की कोशिश भी इस संकल्प को कमज़ोर नहीं कर सकी है। यमनी राष्ट्र ने न सिर्फ़ यह कि हमलावर गठजोड़ के मुक़ाबले में अपने प्रतिरोध को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया बल्कि इस दौरान उसने अपनी आंतरिक व स्वदेशी क्षमताओं को इस्तेमाल करके अपने मीज़ाइलों व ड्रोनों की ताक़त बढ़ाई और इसके माध्यम से सऊदी गठजोड़ के हवाई वर्चस्व की भी हवा निकाल दी।
इन हालात में सऊदी अधिकारी अपनी हार पर पर्दा डालने के लिए ईरान पर आरोप लगा रहे हैं कि वह हूसियों को ड्रोन और मीज़ाइल दे रहा है। सऊदी अरब के विदेश राज्य मंत्री आदिल अलजुबैर ने शनिवार को दावा किया कि जिन मीज़ाइलों व ड्रोनों से सऊदी अरब को निशाना बनाया जा रहा है, वे ईरानी हैं। अलजुबैर के दावे और आरोप की अनदेखी करते हुए उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि क्या हथियार, जंगों का फ़ैसला करते हैं? अगर ऐसा होता तो अमरीका व अन्य पश्चिमी देशों से अरबों डाॅलर के विभिन्न प्रकार के हथियार ख़रीदने वाला सऊदी अरब, पूरे यमन पर नियंत्रण कर चुका होता। सच्चाई यह है कि अलजुबैर व अन्य सऊदी अधिकारी जिस चीज़ को समझना ही नहीं चाहते वह यमनी राष्ट्र का संकल्प और उसका प्रतिरोध है। यमन के लोग किसी भी मूल्य पर अवैध क़ब्ज़े को स्वीकार करने और अपनी आज़ादी को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। अगर ऐसा न होता तो सऊदी अरब की सैन्य शक्ति और यमनी बलों की सैन्य शक्ति की तुलना करने से यह बात स्पष्ट है कि यमन युद्ध को कुछ ही हफ़्तों में ख़त्म हो जाना चाहिए था।
इस आधार पर ऐसा लगता है कि अपनी हार का ठीकरा दूसरों के सिर फोड़ने की सऊदी अधिकारियों की कोशिश का कोई नतीजा नहीं निकलेगा और वे हमलावरों के मुक़ाबले में यमनी राष्ट्र के संकल्प की अनदेखी करके कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे। इस तरह के दावे करके न सिर्फ़ यह कि वे यमन के दलदल से नहीं निकल पाएंगे बल्कि पूरी दुनिया से अपना मज़ाक़ भी उड़वाएंगे। यह बात बिलकुल भी अहम नहीं है कि मीज़ाइल व ड्रोन यमनी हैं या ईरानी क्योंकि हर राष्ट्र को अपनी रक्षा के लिए हर संभव मार्ग से हथियार हासिल करने का हक़ है, बल्कि अहम उस राष्ट्र का संकल्प है जो सऊदी हमलावरों के सामने झुकना नहीं चाहता।