अमरीका के अलग-थलग पड़ जाने के बारे में पिलर ने जो बात कही है, वही बात उनसे पहले भी कई अमरीकी अधिकारी कह चुके हैं लेकिन उन्होंने अपने लेख में एक नई बिंदु की तरफ़ इशारा किया है और वह, विश्व स्तर पर अमरीका के अलग-थलग पड़ने के मुख्य कारण के रूप में ईरान की भूमिका है। उनकी यह बात, विश्व मंच पर ईरान की अहम व प्रभावी भूमिका को स्वीकार करने के समान है। पिलर चाहते तो विश्व मंच पर विशेष कर अमरीका के पारंपरिक यूरोपीय घटकों के बीच उसके अलग-थलग पड़ने को नैटो पर ट्रम्प के निरंतर हमलों के कारण यूरोप से वाॅशिंग्टन के संबंधों में आने वाली खटास, चीन व यूरोपीय संघ के ख़िलाफ़ ट्रम्प की व्यापारिक लड़ाइयों, पेरिस जलवायु समझौते और इसी प्रकार की अन्य अंतर्राष्ट्रीय संधियों व संगठनों से अमरीका के निकल जाने या फिर "अमेरिका फ़र्स्ट" के ट्रम्प के नारे को क़रार दे सकते थे, लेकिन उन्होंने सिर्फ़ ईरान को अमरीका के अलग-थलग पड़ने का कारण बताया है क्योंकि उल्लेखित सभी कारणों में से सिर्फ़ ईरान ही सार्वजनिक मंच पर अमरीका को अपमान का कड़वा स्वाद चखा सका।
अमरीका को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में दो बार अलग-थलग पड़ने का अपमान सहन करना पड़ा है। एक बार दूसरे विश्व युद्ध के बाद और दूसरी बार जब जर्मनी, फ़्रान्स और ब्रिटेन समेत सुरक्षा परिषद के सभी सदस्यों ने ईरान के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिबंध लौटाने और इसी तरह उस पर लगे हुए हथियारों के प्रतिबंध की समय सीमा बढ़ाने की वाॅशिंग्टन की मांग को ख़ारिज कर दिया। इसमें रोचक बात यह थी कि अमरीकी प्रस्ताव को रूस व चीन की ओर से वीटो करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ी और यह प्रस्ताव अपने आप ही रद्द हो गया। इस पूरे मामले में 15 देशों में से एकमात्र देश जिसने अमरीका का साथ दिया वह डोमिनिकन था। ईरान के कारण अमरीका को सुरक्षा परिषद में अलग-थलग पड़ने का जो अपमान सहना पड़ा वह, उस बड़े अपमान का एक भाग था, जिसे वाॅशिंग्टन को ट्रम्प की ग़लत और विफल नीतियों के कारण सहन करना पड़ा है। अमरीका को सुरक्षा परिषद से दो बार थप्पड़ खाना पड़ा, पहली बार उसे उस वक़्त थप्पड़ पड़ा था जब परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों यानी ब्रिटेन, फ़्रान्स, जर्मनी, रूस व चीन ने ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों की बहाली की ट्रम्प की कोशिशों का विरोध किया था। इससे न केवल यह कि अमरीका विश्व स्तर पर अलग-थलग पड़ गया बल्कि वह उन सभी सरकारों व कंपनियों से टकराने के लिए भी तैयार हो गया जो ईरान में पूंजी निवेश करना चाहती थीं।
आर्थिक आतंकवाद के माध्यम से ईरान को झुकाने में नाकामी के बाद ट्रम्प ने सोचा कि फ़ार्स की खाड़ी में जहाज़रानी की सुरक्षा के बहाने एक अंतर्राष्ट्रीय सैन्य गठजोड़ बना कर और ईरान का घेराव करके उस पर दबाव डाला जाए। उनकी यह कोशिश, पिछली कोशिशों से ज़्यादा निराशा के साथ ख़त्म हुई क्योंकि ब्रिटेन के अलावा कोई भी इस गठजोड़ में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हुआ और ब्रिटेन ने भी अपनी नौसेना के कुछ जहाज़ फ़ार्स की खाड़ी में भेजने पर सहमति जताई लेकिन वह भी ईरान से थप्पड़ खाने के बाद बहुत जल्दी अमरीका को अकेले छोड़ने पर मजबूर हो गया। अमरीका के आदेश पर जिब्राल्टर में ब्रिटेन के अधीन बलों द्वारा ईरान के तेल टैंकर को रोके जाने के बाद ईरान ने अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन करने के कारण ब्रिटेन के एक तेल टैंकर को फ़ार्स की खाड़ी में पकड़ लिया और जब तक ब्रिटेन ने ईरानी तेल टैंकर को नहीं छोड़ा तब तक उसने भी ब्रिटिश तेल टैंकर को नहीं छोड़ा। यूरोपीय संघ समेत दुनिया के किसी भी देश ने ट्रम्प के दृष्टिगत सैन्य गठजोड़ में शामिल होने के निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया।
फ़्रान्स की रक्षा मंत्री फ़्लोरेंस पार्ली ने कहा कि संयुक्त अरब इमारात में पेरिस की समुद्री छावनी है और वह समुद्री युद्धक जहाज़ों का साथ देने का इरादा नहीं रखता। उन्होंने कहा कि हमारे विचार में अमरीका के इस क़दम से तनाव कम नहीं होगा बल्कि इसका नकारात्मक असर पड़ेगा क्योंकि तेहरान इस दुश्मनी मानेगा। उनका कहना था कि हम अपने आपको एक यूरोपीय देश के रूप में ही पेश करने की कोशिश कर रहे हैं और हमारे लिए सबसे अहम बात यह है कि एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ें और वह लक्ष्य है, तनाव कम करना और अपने हितों की रक्षा करना। जर्मनी, आस्ट्रेलिया और अन्य देशों ने भी जो पारंपरिक रूप से अमरीका के घटक समझे जाते हैं, यही नीति अपनाई है।
आज अमरीका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को एक भारी और कठिन धरोहर का सामना है जो ट्रम्प की बेलगाम आंतरिक व विदेश नीति का नतीजा है। ट्रम्प की विदेश नीति की धरोहर का सबसे बड़ा भाग, जिस रूप में भी हो, ईरान से संबंधित है। वह देश जिसे ट्रम्प हर ओछे से ओछे हथकंडे और हर घटिया से घटिया चाल के माध्यम से अलग-थलग करना, उसका घेराव करना और उसे भूख में ग्रस्त करना चाहते थे लेकिन ईरानी जनता के प्रतिरोध, नेतृत्व की बुद्धिमत्ता और सशस्त्र बलों के साहस के चलते तेहरान ने समीकरणों को बदल दिया और अमरीका को ही अलग-थलग कर दिया। इस आधार पर अगर जो बाइडन अमरीका को एकांत से निकालना चाहते हैं तो उनके पास बिना शर्त, परमाणु समझौते में लौटने और ईरानी जनता के ख़िलाफ़ लगाए गए सभी अत्याचारपूर्ण प्रतिबंधों को हटाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।