विदित रूप से ऐसा लगता है कि यह युद्ध आज़रबाइजान और आर्मिनिया का नहीं बल्कि आर्मिनिया और तुर्की के बीच युद्ध है क्योंकि अर्दोगान ने जिस तरह की बात की है उससे साफ पता चल रहा था कि तुर्की, आज़रबाइजान की मदद का इरादा रखता है लेकिन इस बार की झड़पें, पहले होने वाली झड़पों से अलग हैं। युद्ध, उत्तर और पूरब से आज़रबाइजान के सैनिकों के अचानक हमलों से शुरु हुआ और उसके परिणाम में आरंभ में ही आक्रमणकारी सैनिक, सीमा पर स्थित आर्मिनिया के नगरों पर क़ब्ज़ा करने मे सफल हो गये। आज़रबाइजान के सैनिकों यह तेज़ी दर अस्ल उन अत्याधुनिक ड्रोन विमानों की वजह से थी जो उन्हें तुर्की ने दिये हैं और संभावित रूप से झड़पों का संचालन तुर्की की ही विशेष सैन्य टुकड़ी कर रही थी।
आर्मिनिया के सैनिकों ने पहली चोट खाने के बाद उत्तर पूरब की अपनी कई छावनियों को वापस ले लिया और वहां से आज़रबाइजान के सभी सैनिकों को खदेड़ने में सफलता प्राप्त की। आर्मिनिया के सैनिकों की यह ताक़त भी उन अत्याधुनिक ड्रोन विमानों की वजह से थी जिनका निशाना बेहद सटीक था और इसी लिए यह कहा जा रहा है कि इतना सटीक निशाना लगाने वाले ड्रोन विमान, आर्मिनिया के पास नहीं हैं और संभावित रूप से यह ड्रोन विमान रूस के थे।
इस युद्ध में तुर्की की भूमिका, मीडिया में इस देश के राष्ट्रपति अर्दोगान के तीखे और गर्मा गरम बयानों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि आर्मिनिया और आज़रबाइजान के मध्य इस युद्ध में तुर्की ने सैन्य हस्तक्षेप तक किया है।
जब अमरीका ने आर्मिनिया और आज़रबाइजान के बीच युद्धबंदी, सैन्य कार्यवाही को रोकने और वार्ता की मांग की है तो स्वाभावित रूप से यह सवाल पैदा होता है कि क्या क़रेबाग़ को आर्मिनिया से वापस लेने के लिए सैय कार्यवाही का तुर्की का फैसला, अमरीका की अनुमति के बिना ही किया गया है? विशेषकर इस लिए भी कि तुर्की के इस रुख से आर्मिनिया और आज़रबाइजान में एक बड़ा संकट पैदा हो रहा है।
यह तो निश्चित है कि तुर्की इस तरह का कोई फैसला, अमरीका की सहमति के बिना नहीं कर सकता क्योंकि तुर्की मध्य पूर्व और यूनान व साइप्रेस की सीमा पर अमरीकी सैन्य छावनियों के बीच में स्थित है और यही वजह है कि वाशिंग्टन ने कुछ ही घंटों में तुर्की को अपने युद्धपोत पीछे हटाने और युनान से वार्ता पर मजबूर कर दिया था।

यह सही है कि क़रेबाग की वापसी में तुर्की के बहुत से हित हैं, आज़रबाइजान का गैस, तुर्की के रास्ते युरोप तक जाता है और कैस्पियन सागर और तुर्की के उत्तरी तटों के बीच संपर्क बनने से तुर्की को बहुत से रणनैतिक फायदे होंगे लेकिन अमरीका के हित सब से अधिक महत्वपूर्ण हैं इसी लिए यह कहा जा रहा है कि अमरीका ने आज़रबाइजान के सैनिकों द्वारा आर्मिनिया पर हमले के हालात पैदा किये हैं और उसके कुछ कारण यह हैः
- अमरीका आज़रबाइजान विशेष कर क़रेबाग में मुंबई और सेंटपीटर्सबर्ग संपर्क लाइन काटना चाहता है इस लाइन के कटने से, भूमध्य सागर और लाल सागर के मार्ग से पश्चिम के द्वार पर रूस, चीन और ईरान की रणनीति पर अंकुश लगाने में अमरीका को मदद मिल सकती है यही वजह है कि वाशिंग्टन इस लाइन पर अपना नियंत्रण बनाने की कोशिश कर रहा है।
- कैस्पियन सागर से लेकर ब्लैक सी तक जाने वाली लाइन पर अमरीका तुर्की की मदद से अपना वर्चस्व जमाना चाहता है। यह लाइन आज़रबाइजान और तुर्की से गुज़रती है और इसे गैस और सैन्य उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया जाता है।
- अमरीका इस तरह रूस के बिल्कुल निकट, आज़रबाइजान, आर्मिनिया और जार्जिया में आग लगाना चाहता है ताकि उसकी आंच रूस को भी महसूस हो।
- क्रीमिया पर क़ब्ज़े के बाद ब्लैक सी पर रूस का प्रभाव बढ़ गया है इस लिए अमरीका उस पर दबाव डालना चाहता है और इसी तरह एशिया और कफकाज़ में रूस के बढ़ते प्रभाव पर अंकुश लगाना चाहता है।
- अमरीका इस तरह से तुर्की और ईरान और तुर्की व रूस के बीच तनाव का एक बहाना पैदा कर रहा है और हो सकता है कि आज़रबाइजान और आर्मिनिया के बीच इस युद्ध का सब से बड़ा कारण अमरीकियों के लिए यही हो।