20 अगस्त को अमरीका ने ईरान पर राष्ट्र संघ के प्रतिबंधों को 18 अक्तूबर 2020 के बाद भी बाक़ी रखने के लिए परमाणु समझौते के स्नैपबैक तंत्र की शुरूआत की थी, जिसे 20 सितम्बर को पूरा एक महीना हो जाएगा और वाशिंगटन के दावे के मुताबिक़, 21 सितम्बर से ईरान के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र संघ के समस्त प्रतिबंध फिर से लागू हो जायेंगे।

लेकिन इस बार ईरान के ख़िलाफ़, अमरीका के साथ उसके पारंपरिक सहयोगी पश्चिमी देशों में से कोई नहीं खड़ा है, इसलिए वह पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया है और अगर उसने स्नैपबैक तंत्र द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिबंधों को लागू करने की बात की तो वास्तव में वह ख़ुद पर ही प्रतिबंध लगा रहा होगा और ख़ुद को ही दुनिया में अलग-थलग कर रहा होगा।
यह बात ट्रम्प प्रशासन को भी किसी हद तक समझ में आ गई है, इसीलिए जैसे जैसे 20 सितम्बर का दिन नज़दीक आता जा रहा है, अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो का लहजा काफ़ी नर्म पड़ता जा रहा है।
अब उन्होंने दावा किया है कि वाशिंगटन, अकेले अपने दम पर तेहरान को रूस और चीन से हथियार नहीं ख़रीदने देगा।
पोम्पियो ने फ़्रांस इंटर रेडियो से बात करते हुए यह धमकी दी है, जिसका खोखला होना ख़ुद उनके लहजे से साफ़ ज़ाहिर है।
अमरीकी विदेश मंत्री का कहना था कि हम ईरान को चीन से टैंक और रूस से मिसाइल रक्षा प्रणाली और लड़ाकू विमान नहीं ख़रीदने देंगे, क्योंकि वह इन हथियारों को हिज़्बुल्लाह तक पहुंचा सकता है।
पोम्पियो के इस दावे से साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि वह ईरान के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिबंधों की अवधि को आगे बढ़ाने के ट्रम्प प्रशासन के प्रयासों की नाकामी की बात स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन सीधे और आसान लफ़्ज़ों में हार स्वीकार करने से बच रहे हैं।
हालांकि उन्होंने यहां तक सच्चाई स्वीकार कर ली कि ईरान विरोधी प्रतिंबधों की अवधि को आगे बढ़ाने को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वाशिंगन को किसी तरह की कोई सफलता हाथ नहीं लगी है।
अमरीका ने अगस्त में ईरान पर लगे हथियारों के प्रतिबंधों की अवधि को आगे बढ़ाने के लिए सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पेश किया था, जिसके समर्थन में 15 सदस्यों वाली परिषद में से केवल एक वोट पड़ा था।
उसके बाद, 20 सितम्बर को वाशिंगटन ने परमाणु समझौते के स्नैपबैक प्रावधान के इस्तेमाल का दावा किया था, ताकि ईरान के ख़िलाफ़ समस्त अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध एक बार फिर लागू हो जाएं, लेकिन सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों और 2015 के परमाणु समझौते में शामिल देशों ने अमरीका का समर्थन करने से इनकार कर दिया।
हर मोर्चे पर मुंह की खाने के बाद, अब ट्रम्प यह दावा कर रहे हैं कि वाशिंगटन, ईरान को रूस और चीन से हथियार ख़रीदने की अनुमति नहीं देगा, लेकिन वह यह भूल रहे हैं कि अमरीका में इतना दम नहीं है कि वह ईरान, रूस और चीन के रास्ते में रुकावट बन सके।