10 सितंबर 2020 - 13:06
इस्राईली अख़बार ने सुनाई पर्दे के पीछे की कहानी, इमारात इस्राईल समझौते में प्रमुख भूमिका में थे टोनी ब्लेयर, अरब देशों और इस्राईल के बीच स्थापित किया गया ख़ुफ़िया चैनल

इस्राईली अख़बार इस्राईल ह्यूम ने ख़ुलासा किया है कि लंदन, अबू धाबी और साइप्रस की राजधानी निकोशिया में ज़ायोनी प्रधानमंत्री नेतनयाहू के सलाहकार और इमारात के मंत्री की ख़ुफ़िया बैठकों का सिलसिला चला।

यह बैठकें मशहूर वकील इसहाक़ मोलख़ो और इमाराती सरकार के मंत्री के बीच में हुईं जिनमें इमारात और इस्राईल के बीच संबंधों की बुनियाद तैयार की गई।

इस पूरी ख़ुफ़िया प्रक्रिया में पर्दे के पीछे रहते हुए पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने ख़ास भूमिका निभाई। वही टोनी ब्लेयर जिन्होंने इराक़ में महाविनाश के हथियारों के बारे में बढ़ चढ़कर झूठ बोला था और झूठ खुल जाने के बाद भी उन्हें कोई शर्मिंदगी नहीं हुई। इस्राईल ह्यूम से ख़ास बातचीत में ब्लेयर ने कुछ ब्योरा देते हुए बताया कि यह बैठकें 2015 से शुरू हो गई थीं ख़ास भूमिका निभाई। इस्राईल हूयम और 2018 में मोलख़ो के त्यागपत्र तक जारी रहीं। मगर जब मोलख़ो पर पनडुब्बियों से जुड़े कांड में लिप्त होने का आरोप लग गया तो उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा।

इमाराती मंत्री और इस्राईली सलाहकार की बैठकें अबू धाबी, लंदन और निकोशिया में होती रहीं। शुरू में तो इन बैठकों में टोनी ब्लेयर भी मौजूद होते थे मगर बाद में उन्होंने पर्दे के पीछे रहते हुए काम आगे बढ़ाया। वार्ता में एक गंभीर मुद्दा इमारात की धरती पर फ़िलिस्तीनी नेता महमूद मबहूह की इस्राईली एजेंटों के हाथों हत्या से संबंधित था और इमारात यह आपत्ति बार बार जता रहा था कि इस्राईल ने इमारात में फ़िलिस्तीनी नेता की हत्या करके बेहद ख़तरनाक काम किया क्योंकि इससे इमारात की स्थिति भी कमज़ोर हुई थी।

इस मुद्दे पर इस्राईली प्रधानमंत्री नेतनयाहू और इमारात के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन ज़ाएद की टेलीफ़ोनी वार्ताएं हुईं और नेतनयाहू किसी न किसी तरह बिन ज़ायद को मनाने में कामयाब हो गए।

अब बहुत से पर्यवेक्षक यह मानते हैं कि इमारात के बारे में जो कुछ हुआ वही दूसरे अरब देशों के बारे में भी किया जा रहा है और इस संदर्भ में इस्राईल और उसके घटकों की कोशिश यह रहती है कि अरब नेताओं की कमज़ोरियां तलाश करें। इमारात के बाद अब वही सारे मोहरे सऊदी अरब, क़तर, ओमान और बहरैन के अधिकारियों पर काम कर रहे हैं।

मगर इस बीच इस्राईल और उसके घटकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्र की वह ताक़तें हैं जो फ़िलिस्तीन के मामले में जनता की उमंगों और इच्छा का सम्मान करते हुए इस मुद्दे पर किसी भी सौदेबाज़ी के लिए तैयार नहीं हैं।