7 सितंबर 2020 - 13:34
अगर हम संभलना और जीतना चाहते हैं तो ईरान, तुर्की और हिज़्बुल्लाह की तरह हर पहिचान को हाशिए पर रखकर केवल इस्लामी पहिचान को नज़र के सामने रखना होगा!

रायुल यौम अख़बार के एक लेख पर एक पढ़े लिखे इंसान ने कमेंट लिखा कि हमें पहले यह तय कर लेना चाहिए कि हम कौन और क्या हैं? क्या सबसे पहले हम अरब हैं, या सबसे पहले मुसलमान हैं, सबसे पहले हम सुन्नी हैं या शीया हैं?

सबसे पहली पहिचान हमारा देश है या हमारा क़बीला है? हमारे सामने एक बड़ा ही कामयाब अनुभव लेबनान के हिज़्बुल्लाह आंदोलन का है। हिज़्बुल्लाह ने यह साफ़ कर दिया कि हम शीया हैं, लेबनानी हैं, शामी हैं, मुसलमान हैं, अरब हैं। इन्हीं प्राथमिकताओं के आधार पर वह काम करते हैं और हर ग़रीब और कमज़ोर की मदद के लिए तैयार रहते हैं। नतीजा यह निकला है कि हिज़्बुल्लाह आज एक बड़ी ताक़त में बदल चुका है। जबकि लेबनान में शीया बिल्कुल हाशिए पर थे, बटे हुए थे, ग़रीबी के हालात में थे।

कमेंट करने वाले सज्जन की बात से मैं सहमत हूं बस इस बात को मैं नहीं मानता कि हिज़्बुल्लाह ने सबसे पहले ख़ुद को शीया माना है। मुझे मालूम है कि हिज़्बुल्लाह ने सबसे पहली प्राथमिकता यह रखी कि वह मुसलमान हैं और उसके बाद दूसरी प्राथमिकताओं की बारी आती है। वैसे मुसलमान धर्मगुरुओं से मेरी विनती है कि वह शीया सुन्नी की रुकावटों को दूर करें क्योंकि इस्लाम के शुरू के दौर में इस तरह की रुकावटें नहीं थीं।

1940 के दशक की बात है कि मैं प्राइमरी में पढ़ता था। उस समय गर्मी की छुट्टियों में मैं अलख़लील शहर में अलकरूम इलाक़े में चला जाता था जहां मेरी फुफी रहती थीं। मैंने गर्मी की छुट्टियां, स्वीज़रलैंड, होनोलूलू और न जाने कहां कहां गुज़ारी हैं मगर मुझे जो लुत्फ़ अलकरूम में आया करता था वह कहीं नहीं मिला। वहां की सादगी से भरी ज़िंदगी अब तक मुझे याद है। मेरे फुफा का नाम शैख़ इज़्ज़त था। उन्होंने अपना आधा जीवन उस फ़िलिस्तीन में गुज़ारा था जो ओटोमन एम्पायर का हिस्सा हुआ करता था और आधा जीवन उस दौर में गुज़ारा जब फ़िलिस्तीन ब्रिटेन के अधीन था। वह मुझसे मज़ाक़ में यह सवाल पूछते थे कि तुम मुसलमान हो या अरब या बैतुल मुक़द्दसी, क्योंकि हम बैतुल मुक़द्दस के रहने वाले थे, या ख़लीली, क्योंकि हमारा परिवार अस्ल में अलख़लील में कभी रहा करता था।

शैख़ इज़्ज़त का जो सवाल था दरअस्ल कमेंट करने वाले ने भी वही सवाल उठाया है कि हमें अपनी पहिचान की प्राथमिकताओं को सही क्रम में रखना चाहिए। अगर हम यह काम नहीं करेंगे तो अगले 100 साल तक इसी तरह भटकते रहेंगे।

मैंने सूमालिया और कोमोरस द्वीप समूह को छोड़ कर सारे अरब देशों की कई कई यात्राएं की हैं और जहां कहीं भी अलगाववाद का आंदोलन चल रहा है वहां लोगों से मिल चुका हूं, मैंने कुर्द जाति के लोगों से भी बात की, बरबर जाति के लोगों से भी मिला और इस नतीजे पर पहुंचा कि अगर हम अलग अलग पहिचान के चक्कर में पड़ेंगे तो कभी कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे, हमें देखना चाहिए कि ईरान, तुर्की और हिज़्बुल्लाह ने इस्लाम को अपनी पहली पहिचान के रूप में स्वीकार किया है तो वह बड़ी से बड़ी ताक़त को आज खुलकर ललकारते हैं और कामयाबी से मुक़ाबला करते हैं।

डाक्टर अब्दुल हई ज़लूम

लेखक व ऊर्जा मामलों के वरिष्ठ सलाहकार