इस बात में ज़रा भी शक नहीं कि शहीदों के सरदार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफ़ादार साथी, बज़ाद इंसान के प्रतीक थे जो कर्बला की घटना के अमर होने का एक अन्य कारण हैं।

इमाम हुसैन अलैहिसस्लाम ने दुनिया के आज़ाद लोगों के लिए अपनी आज़ादी व स्वाधीनता को मशहूर शायर से हुयी मुलाक़ात में ज़ाहिर किया।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के वफ़ादार साथियों ने उनको आदर्श बनाकर उन सभी चीज़ों से ख़ुद को मुक्त कर लिया जो इंसान की मुक्ति में बाधा बनती हैं।
हज़रत ज़ुहैर को इस मुलाक़ात की दावत पर बहुत हैरत हुयी क्योंकि वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के काफ़िले से दूर दूर चल रहे थे। हज़रत ज़ुहैर की बीवी बड़ी आत्मज्ञानी महिला थीं, उन्होंने अपने शौहर से कहा : कैसा सौभाग्य है।
पैग़म्बरे इस्लाम की संतान तुम्हारे पास एलची भेजे और तुम उनसे मिलने न जाओ? उठो और फ़ौरन जाओ देखो कि पैग़म्बरे इस्लाम के नाती तुमसे क्या कहते हैं और पलट आओ।