अब इमारात और इस्राईल के बीच समझौते का एलान हो गया है तो इसके नतीजे में ईरान और तुर्की का एलायंस और भी मज़ूबत होता जा रहा है। अमरीकी प्रतिबंधों से ईरान की ताक़त पर कुछ ज़्यादा असर नहीं पड़ा है जबकि इस समय तुर्की यह कोशिश कर रहा है कि तेहरान और अबू धाबी के संबंधों में आने वाले तनाव का फ़ायदा उठाते हुए ईरान से अपने संबंधों को पहले से ज़्यादा मज़बूत करे।
इमारात के साथ समझौता हो जाने के बाद इस्राईल के लिए रास्ता खुल जाएगा और वह ईरान के समुद्री तट के सामने इमारात की सीमा के भीतर सैनिक छावनी बना सकेगा जहां से ईरान पर नज़र रखना इस्राईल के लिए आसान हो जाएगा।
दूसरी ओर अमरीका ने यह कोशिश शुरू कर दी है कि तुर्की से अपने ख़राब होते जा रहे संबंधों के बीच इमारात को एफ़-35 युद्धक विमान बेचे जो वह इससे पहले तुर्की को बेचना चाह रहा था। तुर्की ने रूस से एस-400 एयर डिफ़ेन्स सिस्टम ख़रीदा तो अमरीका ने अपना इरादा बदल दिया।
इस बीच एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि बेशक इमारात ने इस्राईल से अपने समझौते का एलान किया है और इस बारे में बहुत सी बहसें शुरू हो गई है मगर सच्चाई यह है कि इस्राईल से इमारात ही नहीं कई अरब देशों के संबंध कई दशकों से चले आ रहे हैं। ख़ुफ़िया तौर पर इस्राईल के सुरक्षा व इंटेलीजेन्स अधिकारी और नेता इन देशों के दौरे करते रहे हैं। इसका मतलब यह है कि समझौते का एलान हो जाने के बाद इस्राईल को ईरान के ख़िलाफ़ कोई नया स्पेस नहीं मिलने जा रहा है जो कुछ उसे चाहिए था वह इस्राईल को पहले से ही हासिल था। अगर इस्राईल ईरान के ख़िलाफ़ अपनी कोई योजना पूरी नहीं कर पाया तो इसकी वजह यह थी कि यह इस्राईल के बस में ही नहीं था। इसलिए इस्राईल से अरब देशों के समझौते के एलान के बाद ईरान के लिए कोई ख़ास फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है। हो सकता है कि प्रोपैगंडा करने के लिए इस्राईली अधिकारियों को कुछ सामग्री मिल जाए मगर कोई गेम चेंजर उपलब्धि उनके हाथ नहीं लगेगी।