29 अगस्त 2020 - 13:31
मुहर्रम का महीना- 4

समस्त ईश्वरीय दूतों की एक परंपरा, अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करना रही है।

 इन सबको ईश्वर की ओर से आदेश था कि वे अत्याचार और अत्याचारियों से संघर्ष करते हुए अत्याचारी व्यवस्थाओं को समाप्त करें।  इन ईश्वरीय दूतों पर न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करने का दायित्व था।  मिसाल के तौर पर हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा, हज़रत ईसा और पैग़म्बरे इस्लाम सहित समस्त ईश्वरीय दूतों ने इसका कड़ाई से पालन किया।  सभी ईश्वरीय दूतों का उद्देश्य, संसार के सभी वंचितों और अत्याचारग्रस्त लोगों को अत्याचार से मुक्ति दिलाना था।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम, जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स) की छत्रछाया में जीवन गुज़ारा था और जो ईश्वरीय दूतों के कर्तव्यों से भलिभांति अवगत थे, इस बारे में कहते हैं कि ईश्वर ने हज़रत मुहम्मद (स) को इसलिए भेजा कि वे लोगों को हर प्रकार की दासता और अपमान से सुरक्षित करते हुए उन्हें अंधे अनुसरण से सुरक्षित रखें और सबको एकेश्वर का निमंत्रण दें। 

 

गहन समीक्षा से यह वास्तविकता समझ में आती है कि अत्याचारी शासकों ने अपने शासन को मज़बूत करने के लिए हर प्रकार की बुराई का सहारा लिया।  वे वंचितों और अत्याचार ग्रस्त लोगों का अधिक से अधिक दमन करके उन्हें अपनी बात मनवाने के लिए मजबूर करत थे।  इस काम के लिए वे लालच भी देते और अत्याचार भी करते थे।  हालांकि हर प्रकार के अत्याचार और आतंक के बावजूद ईश्वरीय दूतों ने अत्याचारियों के विरुद्ध संघर्ष को कभी समाप्त नहीं किया।  वे लोग मनुष्यों को हर प्रकार की ग़ुलामी से मुक्ति दिलाना चाहते थे।  पैग़म्बरे इस्लाम के बारे में क़ुरआन कहता है कि वे लोगों को हर प्रकार के अत्याचार से सुरक्षित करके उन्हें स्वतंत्र करना चाहते थे।  

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने भी अपने पूर्वजों का अनुसरण करते हुए अपने काल के भ्रष्ट एवं अत्याचारी शासन के विरुद्ध संघर्ष शुरू किया।  दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आन्दोलन के अमर होने का कारण अत्याचार का विरोध करना था।  इमाम हुसैन की अपने पिता हज़रत अली और अपने बड़े भाई की शहादत को अपनी आखों से देखा था।  वे पैग़म्बरे इस्लाम की मूल शिक्षाओं में फेरबदल होते देख रहे थे।  वे आम लोगों पर तत्कालीन शासन के अत्याचार से दुःखी थे और उसका विरोध करते थे।  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के समय में यज़ीद नामक एसे धर्मभ्रष्ट और दुष्ट शासक को कुर्सी पर बिठा दिया गया था जो शराबी, जुआरी और अत्याचारी था।  वह हर प्रकार के पाप खुलेआम किया करता था। अपने बुरे कामों का विरोध करने वाले को यज़ीद बिल्कुल भी पसंद नहीं करता था और उसे रास्ते से हटवा दिया करता था।

 

तत्कालीन समाज तेज़ी से पतन की ओर बढ़ रहा था। चारों ओर असत्य का बोलबाला था।  उस समय सत्य के मार्ग पर चलने वालों को उंगलियों पर गिना जा सकता था, इस्लाम के नाम पर हर प्रकार की बुराई की जा रही थी। इस्लाम की मूल शिक्षाएं समाज में विलुप्त होती जा रही थीं। सच्चाई व मानवता व न्याय का वह पाठ जो पैग़म्बरे इस्लाम ने सिखाया था अधिकांश लोग भूलते जा रहे थे।  अत्याचार, अन्याय, क्रूरता, असमानता, पथभ्रष्टता तथा हर ओर फैले भ्रष्टाचार के समय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ही वह एकमात्र हस्ती थे जो अपने हाथों में कृपा, मानवता, न्याय व सच्चाई का दिया लिये इस अंधकार से लड़ रहे थे।   उस समय के बहुत से लोगों में यज़ीद का मुक़ाबला करने का साहस ही नहीं था।  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जब यह स्थिति देखी तो उन्होंने इसका खुलकर विरोध किया।  यज़ीद को अच्छी तरह से पता था कि उसके  बुरे कामों का अगर कोई विरोध कर सकता है तो वह हुसैन ही हैं।  इसी बात के दृष्टिगत यज़ीद ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से अपनी बैअत की मांग की थी जिसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने ठुकरा दिया था।  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने  सत्य व असत्य के मध्य अंतर को स्पष्ट करने के लिए जो आंदोलन आंरभ किया था उसके अन्तर्गत उनका यही प्रयास था कि बुराईयों के प्रतीक यज़ीद ने इस्लाम का जो मुखौटा लगा रखा है उसे नोंचकर इस्लामी समाज के सामने उसका असली रूप पेश किया जाए।

 

करबला में जब इमाम हुसैन के मुक़ाबले में हुर का लश्कर आ गया था तो उस समय उन्होंने कहा था कि हे लोगों जान लो कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कथन है कि अगर कोई यह देखे कि अत्याचारी शासक हराम को हलाल और हलाल को हराम कर रहा है और पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा के विरुद्ध काम कर रहा है और निर्दोषों पर अत्याचार कर रहा है तो एसे में यदि कोई चुप्पी साध लें और किसी भी प्रकार से विरोध न करें तो उनका वही स्थान होगा जो अत्याचारी का होगा अर्थात वह नरक में जाएगा।

एक कथन में कहा गया है कि अत्याचारी और अत्याचार सहने वाले दोनों ही नरक की आग का ईंधन होंगे।  अत्याचारी अपने अत्याचारों के कारण जबकि अत्याचार सहने वाला अपनी इस ग़लत हरकत के कारण कि उसने अत्याचार का विरोध न करके उसको सहन क्यों किया।  कहते हैं कि हर प्रकार के भ्रष्टाचार, उल्लंघन, विश्वासघात और अन्य बहुत सी बुराइयों का कारण ईश्वर और परलोक को नकारने में निहित है।  दूसरे शब्दों में हर प्रकार के पाप में एक कुफ्र छिपा है।

तत्कालीन शासक की बुराइयों का उल्लेख करते हुए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा था कि क्यों तुम लोग नहीं देख रहे हो कि सत्य को नकारा जा रहा है,  बुरे कामों से रोका नहीं जा रहा है।  एसे में कोई भी दीनदार इंसान ख़ामोश नहीं बैठ सकता।

यज़ीद और तत्कालीन शासकों का अत्याचार इतना अधिक बढ़ चुका था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के लिए अब चुप बैठना उचित नहीं था।  उन्होंने खामोश बैठकर अपनी जान बचाने की तुलना में खुलकर अत्याचारी शासक के विरोध को वरीयता दी।  उन्होंने कहा कि मेरी दृष्टि में इस समय चुप बैठने के मुक़ाबले में अत्याचारी का मुक़ाबला करना ज़रूरी है चाहे उस रास्ते में मैं मारा ही क्यों न जाऊं।