एक मिशन है ईरान के ख़िलाफ़ अधिक से अधिक देशों को लामबंद करना और दूसरा मिशन है ज़्यादा से ज़्यादा अरब देशों को इस्राईल से दोस्ती के लिए तैयार करना।
इस्राईल से दोस्ती का जहां तक सवाल है तो इमारात ने बेशक इसका एलान कर दिया है लेकिन अभी से तनाव शुरू हो गया है और सूचनाएं हैं कि इमारात ने इस्राईल के साथ प्रस्तावित बैठक टालने की मांग की है। इमारात के अलावा दूसरे कई अरब देशों को इस्राईल से दोस्ती के लिए तैयार करना पोम्पेयो के ज़िम्मे है और इसी उद्देश्य से वह सूडान की यात्रा पर गए थे।
सूडान में प्रधानमंत्री अब्दुल्लाह हमदूक ने अमरीकी दबाव स्वीकार करने से साफ़ इंकार कर दिया और यह कह दिया कि उनकी सरकार के पास जनता की ओर से यह मैनडेट नहीं है कि सूडान इस्राईल से संबंध स्थापित करे। उन्होंने कहा कि सूडान को आतंकवाद के समर्थक देशों की ब्लैक लिस्ट से निकालने का विषय अलग है और इस्राईल से दोस्ती का मुद्दा अलग है।
इसका मतलब यह है कि पोम्पेयो के मिशन को सूडान में ज़ोरदार झटका लगा है। दरअस्ल पोम्पेयो सूडान की जनता से बख़ूबी परिचित नहीं हैं इसीलिए उनको लगा था कि यह मिशन आसान होगा। अमरीका इससे पहले सूडान को धोखा दे चुका है और इसी धोखे के कारण सूडान का एक तिहाई भाग अलग होकर नया देश बन चुका है। अमरीकियों ने ख़ारतूम से वादा किया था कि दारफ़ूर के अलग हो जाने के बाद सूडान की आर्थिक स्थिति में सुधार आ जाएगा मगर अमरीका ने अपना वादा पूरा नहीं किया।
मोरक्को के प्रधानमंत्री भी एलान कर चुके हैं कि देश के नरेश, सरकार और जनता का स्टैंड साफ़ है कि हम फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों का समर्थन करते हैं।
इसका मतलब यह है कि पोम्पेयो को इस मिशन में बुरी तरह नाकामी हाथ लगी है।
दूसरा मिशन ईरान के ख़िलाफ़ देशों को एकजुट करने का है। इस मिशन में भी अमरीका के क़रीबी घटक देश सहयोग के लिए तैयार नहीं हैं। यूरोपीय देशों ने भी अपने बयानों में कह दिया है कि अमरीका को यह अधिकार नहीं है कि सुरक्षा परिषद में ईरान पर कोई अतिरिक्त प्रतिबंध लगवाए।
ट्रम्प प्रशासन के लिए चिंता की बात यह है कि यह विफलताएं उस समय मिल रही हैं जब राष्ट्रपति चुनाव क़रीब आ गया है और ट्रम्प यह चुनाव किसी भी क़ीमत पर जीतना चाहते हैं। ट्रम्प के बारे में लिखी गई हालिया किताबों में तो कहा गया है कि ट्रम्प चुनाव जीतने के अलावा और किसी बारे में सोचना पसंद नहीं करते और वह रूस और चीन से मदद मांग रहे हैं।