इस आधार पर कहा जा सकता है कि पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इस्लाम की रक्षा के लिए जो आंदोलन किया था, वह ईश्वरीय इच्छा के परिप्रेक्ष्य में ही था और इसी लिए वह अमर हो गया।
बनी उमय्या के शासकों ने लोगों में यह प्रचार करने की कोशिश की कि इमाम हुसैन और यज़ीद के बीच टकराव , सत्ता को लेकर है और इमाम हुसैन उमवियों को सत्ता से बेदख़ल करके ख़ुद सत्ता हासिल करना चाहते हैं।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के इस पूरे बयान में और इसके हर वाक्य में हर कोण से ईश्वरीय संकल्प स्पष्ट रूप से दिखाई देता है र यह आशूरा के अमर होने का एक और राज़ है क्योंकि जो भी काम, जो भी बात और जो भी व्यवहार ईश्वरीय रंग ले ले वह अपने आप ही अमर हो जाता है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने काल के ज्ञानियों को संबोधित करते हुए कहा कि अगर तुम हमारी मदद नहीं करोगे और हक़ लेने में हमारी आवाज़ से आवाज़ नहीं मिलाओगे तो तुम्हारे मुक़ाबले में अत्याचारी ज़्यादा ताक़त हासिल कर लेंगे और तुम्हारे पैग़म्बर के प्रकाशमान सूर्य को बुझाने के लिए अधिक सक्रिय हो जाएंगे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का प्रशिक्षण और लालन पालन पैग़म्बरी व इमामत के केंद्र में केंद्र में हुआ था और बनी उमय्या के शासकों के विपरीत, जिन्होंने वास्तविक इस्लाम को मिटा देने के इरादे से सत्ता हथया रखी थी, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम , उमवीयों की ओर से इस्लाम से इस्लाम के सभी आदेशों को रौंदे जाने की ओर से गहरी चिंता में थे और कड़ा रुख़ अपना कर यह दिखा देना चाहते थे कि वे निजी फ़ायदे के लिए आंदोलन नहीं कर रहे हैं बल्कि वे सिर्फ़ और सिर्फ़ ईश्वर के धर्म को बचाने के लिए उठ खड़े हुए हैं।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफ़ादार साथी नवीं मुहर्रम की रात ईश्वर की उपासना व प्रार्थना में इतने लीन थे कि मानो उन्हे अगले दिन की कोई चिंता ही नहीं थी जिस दिन उन्हें एक अन्यायपूर्ण व असमान युद्ध में शहीद होना था।