पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया है: हुसैन (अलैहिस्सलाम ) की शहादत में मोमिनों के दिलों के लिए क एसा गर्मी है जो कभी ठंडी होने वाली नहीं है।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और आशूरा का विषय इतिहास में सदा जीवति रहेगा क्योंकि इस घटना में सत्य, असत्य के सामने डट गया और इमाम हुसैन ने अपनी जान, अपने बच्चों व रिश्तेदारों और साथियों की जान न्योछावर कर दी लेकिन सत्य से कण भर भी विचलित नहीं हुए।
पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शोक सभाओं के आयोजन पर बल देते हुए इसके कार्यक्रमों को इस प्रकार तैयार किया है कि ये सभाएं लोगों के बीच एकता का धुत बन जाएं।

ईसाई लेखक अन्तवान बारा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की महानता के बारे में लिखते हैं कि इमाम हुसैन, धर्मों का अमर रत्न हैं । वे दुनिया के अंत तक सभी धर्मों की जागृत अंतरात्मा हैं, इस लिए कि उनका आंदोलन अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की आस्था के लिए था और उन्होंने इस्लामी समुदाय की जागृत अंतरात्मा के आधार पर काम किया।
अन्तवान बारा आगे चल कर यज़ीद के अस्तय पर होने की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं कि उस समय के शासकों ने नए धर्म इस्लाम की आस्थाओं को जड़ से उखाड़ फेंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

जर्मनी के प्रख्यात दार्शनिक व पूर्वी मामलों के विशेषज्ञ मेसियो मार्बिन अपनी किताब इस्लामी राजनीति में लिखते हैं कि हमारे कुछ इतिहासकारों का अज्ञान इस बात का कारण बना कि वे शियों द्वारा इमाम हुसैन का शोक मनाए जाने को पागलपन बताएं लेकिन उनकी बातें पूरी तरह से निराधार हैं और उन्होंने शियों पर आरोप लगाया है।
पाकिस्तान के विख्यात धर्मगुरू अल्लामा शहंशाह हुसैन नक़वी कहते हैं कि ईश्वर ने क़ुरआन में कह दिया है कि मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी ईश्वर की है और कर्बला भी इसी ज़िम्मेदारी का एक हिस्सा है।

माध्यम से बड़े ही तर्कसंगत ढंग से पेश किया और लोगों को अपनी स्थिति से अवगत कराया। आशूरा की सुबह को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीद की सेना के सामने जो भाषण दिया था उसमें इसका उदाहरण देखा जा सकता है। उन्होंने यज़ीदी सेना से कहा कि वे ध्यानपूर्व उनकी बातें सुनें और न्याय के साथ फ़ैसला करे। उन्होंने कहा कि अगर वे लोग न्याय से काम नहीं लेंगे तो भी उनका भरोसा ईश्वर पर है र वे उनके फ़ैसले से नहीं घबराएंगे। इसके बाद उन्होंने क़ुरआने मजीद के सूरए आराफ़ की आयत संख्या १९६ की तिलावत की जिसमें कहा गया है: निसंदेह मेरा अभिभावक (और पालनहार) वह ईश्वर है जसने (यह) किताब उतारी है और वही भले बंदों की अभिभावकता और मार्गदर्शन करता है।