सुरक्षा परिषद में अमरीका की यह हार इतनी शर्मनाक थी कि उसके प्रस्ताव के पक्ष में 15 सदस्यों में से केवल एक वोट डोमिनिकन रिपब्लिक का मिला, जबकि उसे अपने सबसे बड़े यूरोपीय सहयोगियों तक का समर्थन हासिल नहीं हुआ।
इस हार ने साबित कर दिया कि ईरान के मुद्दे पर अमरीका दुनिया में कितना अलग-थलग पड़ता जा रहा है और उसकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने वाला कोई नहीं है।
सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पारित होने के लिए प्रस्ताव के पक्ष में 9 वोट पड़ने चाहिए और पांच स्थायी सदस्यों में से कोई उसे वीटो न करे।
रूस और चीन जो सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देश हैं, पहले ही ईरान पर लगे हथियारों के प्रतिबंधों की अवधि को आगे बढ़ाने का कड़ा विरोध कर चुके हैं।
2015 में ईरान और विश्व की 6 शक्तियों के बीच होने वाले परमाणु समझौते के तहत 18 अक्तूबर को ईरान पर लगे हथियारों के प्रतिबंध समाप्त हो जायेंगे। हालांकि 2018 में अमरीका ने एकपक्षीय रूप से इस समझौते से निकलने का एलान करते हुए फिर से ईरान के ख़िलाफ़ कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे।
पिछले कई महीनों से ट्रम्प प्रशासन ईरान पर हथियारों के प्रतिबंध को आगे बढ़ाने के लिए हाथ पैर मार रहा है और उसने धमकी दी थी कि अगर सुरक्षा परिषद में उसका प्रस्ताव पारित नहीं हुआ तो वह परमाणु समझौते के उस तंत्र का प्रयोग करेगा, जिसे स्नैपबैक कहा जाता है।
ईरान द्वारा समझौते के उल्लंघन की स्थिति में केवल समझौते में शामिल देश ही स्नैपबैक प्रावधान का इस्तेमाल करने का अधिकार रखते हैं। स्नैपबैक के इस्तेमाल की स्थिति में हथियारों समेत ईरान के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र के वह समस्त प्रतिबंध बहाल हो जायेंगे, जो 2015 से पहले थे।
ख़ुद अमरीका के सहयोगी यूरोपीय देश, वाशिंगटन द्वारा इस प्रावधान के इस्तेमाल की धमकी पर आपत्ति जता चुके हैं और उनका कहना है कि अमरीका अब इस समझौते का हिस्सा नहीं है और उसे ऐसा करने का कोई क़ानूनी अधिकार नहीं है।
पररमाणु समझौते से निकलने के ट्रम्प प्रशासन के फ़ैसले के आलोचकों का मानना है कि अब वाशिंगटन को यह अधिकार तक हासिल नहीं है कि वह यह कह सके कि ईरान समझौते पर अमल कर रहा है या नहीं।
शुक्रवार को सुरक्षा परिषद में अमरीकी प्रस्ताव गिरने के बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने इस मुद्दे पर किसी भी टकराव को टालने के लिए विश्व नेताओं की बैठक के आयोजन पर बल दिया है।
पुतिन ने चेतावनी देते हुए कहा है कि इस क्षेत्र में किसी को भी हुक्म चलाने या ब्लैकमेल करने का अधिकार नहीं है।
वहीं अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के विशेषज्ञों का कहना है कि शुक्रवार को अमरीका की कूटनीतिक हार कोई आश्चर्य की बात नहीं है, हां आश्चर्य की बात शर्मनाक हार है।