दोनों देशों के विदेश मंत्रियों का कहना है कि यह वित्तीय पैकेज राजधानी माले को तीन पड़ोसी आइलेट (टापू) से जोड़ने वाले पुलों के निर्माण के लिए दिया जाएगा।
Warm and fruitful discussion with FM @abdulla_shahid of #Maldives. Agreed that the #COVID19 pandemic has brought the two nations even closer. We will be reliable partners in meeting both aspirations and challenges. pic.twitter.com/Pozmew1q3S
— Dr. S. Jaishankar (@DrSJaishankar) August 13, 2020
मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्लाह शाहिद का कहना था कि एक बार पूरा होने के बाद, यह परियोजना, बुनियादी ढांचे की मालदीव में सबसे बड़ी परियोजना होगी।
कुल मिलाकर, यह परियोजना 20 करोड़ डॉलर की चीन-मालदीव फ़्रैंडशिप ब्रिज परियोजना से तीन गुना अधिक होगी, जिसे पूर्व राष्ट्रपति यामीन की निगरानी में चीन से लोन लेकर बनाया गया था और बाद में उसका नाम बदल दिया गया।

हिंद महासागर में स्थित यह मुस्लिम बहुल राष्ट्र, जो अपने तटों और नीले पानी के लिए पर्यटकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय है, चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का केंद्र बिंदु बन गया है।
भारत, राष्ट्रपति इब्राहिम सोलीह के नेतृत्व में मालदीव की नई सरकार के साथ, एक बार फिर राजनयिक संबंध मज़बूत बनाने की कोशिश में है, जिन्होंने 2018 के चुनावों में चीन समर्थक राष्ट्रपति यामीन की हार के बाद सत्ता संभाली थी।
राष्ट्रपति सोलीह ने नई दिल्ली द्वारा इस वित्तीय पैकेज की घोषणा को मालदीव-भारत सहयोग के लिए एक ऐतिहासिक क्षण बताया है।
3 लाख 40 हज़ार की आबादी और 1,192 द्वीपों वाला यह राष्ट्र, ईस्ट-वेस्ट प्रमुख शिपिंग लेन पर स्थित है। पूर्व राष्ट्रपति यामीन के शासनकाल में मालदीव ने चीन से अरबों डॉलर का लोन लिया था और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं के लिए चीनी कंपनियों को काम दिया था।
चीन-मालदीव के बीच बढ़ते सहयोग से भारत की चिंताएं बढ़ गई थीं, इसलिए कि बीजिंग न केवल भारत के पड़ोसी देशों बल्कि दुनिया भर के देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।