22 जुलाई 2020 - 12:44
क्या भारत डूब रहे अमरीकी साम्राज्यवाद का दामन थामकर चीन के मुक़ाबले में खड़ा हो सकता हैं?

भारत की विदेश नीति में दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादियों का झुकाव हमेशा से ही अमरीका और इस्राईल की ओर रहा है, लेकिन हालिया दिनों में लद्दाख़ के सीमावर्ती इलाक़ों में चीन के साथ दबाव बढ़ने के बाद, इस रुझान में काफ़ी शिद्दत भी देखने में आ रही है।

इस विचार के कट्टर समर्थक, रूस-भारत रणनीतिक संबंधों के बजाए अमरीका-भारत रणनीतिक संबंधों पर ज़ोर दे रहे हैं और उनका मानना है कि नई दिल्ली को मास्को से हथियार ख़रीदने के बजाए, अमरीका से हथियार ख़रीदने चाहिए।

हालांकि एक तीसरा पक्ष जिसका मानना है कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की ज़रूरत है और उसे रूस या किसी भी एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाए, अपनी ज़रूरत के हथियारों और सैन्य उपकरणों के लिए स्रोतों में विविधता लाने के ज़रूरत है।

हालांकि दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी जिनका नेतृत्व प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं, चीन और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी को देखते हुए अमरीका के साथ भारत की ऐसी ही साझेदारी के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि चीन, लम्बे समय के लिए भारत की सुरक्षा के लिए ख़तरा है और अब पहले की तरह रूस, चीन को अपनी सुरक्षा के लिए ख़तरा नहीं समझता है।

वहीं अमरीका, पिछले दो दशकों से चीन के मोर्चे पर भारत को आगे करने की रणनीति पर काम करता रहा है, लेकिन उसे इसमें सफलता 2014 में नई दिल्ली में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी के सरकार के गठन के बाद हाथ लगी।

अमरीका, चीन जैसे शक्तिशाली देश से सीधे टकराने के बजाए, उसे विभिन्न मोर्चों पर उलझाना चाहता है, जिसमें सबसे महत्वपूरण मोर्चा भारत है।

यह स्पष्ट है कि अमरीका और भारत के बीच सुरक्षा सहयोग में लगातार वृद्धि हो रही है। हालांकि इस इस बात के बहुत कम या कोई सबूत नहीं है कि यह रणनीति नई दिल्ली के लिए लाभदायक साबित होगी। जबकि मोदी सरकार को लगता है कि चीन के मुक़ाबले में खड़े होने के लिए अमरीकी बेसाखी की बहुत ज़रूरत है।

यहां यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि शीत युद्ध के दौरान, नई दिल्ली ने मास्को को उस समय रणनीतिक साझेदार के रूप में चुना, जब वाशिंगटन की पूरी दुनिया में तूती बोलती थी, लेकिन अब जब अमरीकी साम्राज्यवाद बिखर रहा है और वह अपने सबसे कमज़ोर दौर से गुज़र रहा है, तो रणनीतिक साझेदार के रूप में उसका चयन करना, क्या अपने पैर पर ख़ुद कुलहाड़ी मारना नहीं है?