यह सवाल इसलिए उठाया जा रहा है कि रूस से चीन के भी बहुत गहरे संबंध हैं और इनमें लगातार विस्तार हो रहा है। चीन ने रूस की गैस के लिए अपना बाज़ार खोल दिया है और इस समय जब पश्चिमी देशों को गैस बेचना रूस के लिए कठिनाइयों भरा काम हो गया तो चीन का रूस के लिए अपने बाज़ार के दरवाज़े खोलना बहुत बड़ा वरदान है।
गलवान घाटी का मामला जब गरमाया तो उस समय अमरीका ने भारत का पक्ष लिया जबकि रूस ने साफ़ साफ़ कहा कि वह इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहता यह मामला भारत और चीन ख़ुद सुलझा सकते हैं।
नई दिल्ली स्थित आब्ज़रवर रिसर्च फाउंडेशन के राधेश्वरी राजागोपालन के अनुसार भारत के कुछ कूटनयिकों को अमरीका पर शक है। भारत को अच्छी तरह याद है कि शीत युद्ध के ज़माने में अमरीका ने पाकिस्तान का साथ दिया था इसलिए भारत के लिए यह उचित नहीं होगा कि पूरी तरह अमरीका के ख़ैमे में चला जाए। बल्कि भारत के लिए यह बेहतर होगा कि बीच का रास्ता अपनाए और अमरीका और रूस दोनों के साथ रिश्तों को विस्तार दे।
इंडियन स्ट्रैटेजिक मैगज़ीन से जुड़े विनय शुक्ला का मानना है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादमीर पुतीन अकतूबर महीने में भारत का दौरा करने वाले हैं और इस दौरे के समय क्लाशनकोफ़ बंदूक़ और कामोव हेलीकाप्टरों के निर्माण सहित कई समझौते हो सकते हैं। दोनों देश एक दूसरे की युद्धक नौकाओं को अपनी अपनी बंदरगाहों पर सेवाएं देने पर सहमति कर चुके हैं। पहले भारत ने इस प्रकार का समझौता अमरीका से किया था।
भारत में अमरीकी लाबी की कोशिश है कि यह देश अमरीका, जापान और आस्ट्रेलिया के एलायंस में शामिल हो जाए मगर इस एलायंस में जाने का मतलब है अमरीका के हाथों इस्तेमाल होना और भारत यह नहीं चाहता।
अमरीका इससे पहले भी भारत को लुभाने की कोशिश कर चुका है। अमरीका चाहता था कि भारत अफ़ग़ानिस्तान में बड़ा रोल निभाए मगर समस्या यह है कि अमरीका हितों और फ़ायदों में भारत को साझीदार नहीं बनाना चाहता बल्कि कठिनाइयों और नुक़सान के बारे में यह कोशिश करता है कि भारत उसका हाथ बटाए।
शायद यही वजह है कि गलवान घाटी के तनाव के समय अमरीका की ओर से खुले समर्थन के एलान के बावजूद भारत अमरीका के झांसे में नहीं आया।
स्रोतः एजेंसियां