अमरीका में राजनैतिक अशांति व नस्लभेद विरोधी प्रदर्शनों में तेज़ी आने के दौरान, अमरीकी मीडिया ने इस तरह की रिपोर्टें दी हैं कि रूस ने अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों को मारने के लिए तालेबान को पैसे दिए हैं। न्यूयाॅर्क टाइम्ज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ अमरीका के गुप्तचर विभाग के अधिकारियों और अफ़ग़ानिस्तान में विशेष सैन्य बलों के कमांडरों ने जनवरी की शुरुआत में सूचित कर दिया था कि उन्हें रूस के एक संदिग्ध कार्यक्रम के बारे में सूचना मिली है जिसके तहत वह अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिको को मारने के लिए तालेबान को पैसे दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार इस शक को उस समय और बल मिला जब तालेबान के ठिकानों पर हमले में अमरीकी सैनिकों को बड़ी संख्या में डाॅलर मिले। अमरीका के एक अन्य सैन्य अधिकारी ने बताया है कि पकड़े गए अफ़ग़ान छापामारों ने पूछताछ के दौरान यह बात स्वीकार की है कि रूसियों ने सन 2019 में उन्हें कुछ प्रस्तावों के साथ काफ़ी मोटी रक़म दी थी।
निश्चित रूप से इस तरह के प्रचार का एक अहम उद्देश्य रूस पर दबाव डालना और आगामी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प का वोट बैंक बढ़ाना है। अमरीका के पूर्व राष्ट्रीय सुूरक्षा सलाहकार जाॅन बोलटन ने इस तरह की रिपोर्टों को काफ़ी ख़तरनाक बताया है। उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि ध्यान योग्य बात यह है कि ट्रम्प कह रहे हैं कि उन्हें इस तरह की रिपोर्ट नहीं मिली है। बोलटन ने कहा कि शायद कोई यह पूछे कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं? मेरे विचार में इसका जवाब यह है कि अमरीकी सैनिकों के ख़िलाफ़ रूस का यह क़दम बहुत ख़तरनाक है और इसके मुक़ाबले में कोई क़दम नहीं उठाया गया है। उन्होंने कहा कि अगर यह रिपोर्ट पिछले चार पांच महीने के बारे में सही हो तो फिर यही कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति ने इसकी अनदेखी की है। अलबत्ता इसका एक लक्ष्य अमरीका में नस्लभेद के ख़िलाफ़ होने वाले प्रदर्शनों को कुचलने की ओर से जनमत का ध्यान हटाना भी हो सकता है।
अमरीका में इस समय इस देश का सबसे बुरा राजनैतिक संकट जारी है और इसे रोकने के लिए ट्रम्प ने सेना तक को इस्तेमाल करने की बात कही है। यह उस देश के लिए आत्महत्या की तरह होगा जहां हथियार ख़रीदने व बेचने पर कोई रोक नहीं है। नस्लभेद के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों को कुचलने में सेना का सहारा लेना, इस राजनैतिक संकट को अधिक जटिल बना देगा क्योंकि संभव है कि इससे आंतरिक युद्ध शुरू हो जाए। इन सब बातों के मद्देनज़र ऐसा प्रतीत होता है कि अमरीका के राजनैतिक व प्रचारिक हल्क़े रूस पर इस तरह का आरोप लगा कर उन प्रदर्शनकारियों को कुचलने का मार्ग समतल कर रहे हैं जो सेना के मुक़ाबले में हथियार उठा सकते हैं। इस परिस्थिति में सशस्त्र विरोधी, रूस के पिट्ठू और एजेंट कहलाएंगे और उनका बुरी तरह दमन किया जाएगा। शीत युद्ध के दौरान भी ये हल्क़े अमरीकी प्रदर्शनकारियों को कम्यूनिस्ट और सोवियत संघ का जासूस बताया करते थे।