24 जून 2020 - 14:40
भारत में कोरोना संकट भंयकर रूप लेता जा रहा है, इस स्थिति के लिए कौन है ज़िम्मेदार?

भारत में कोरोना वायरस संकट अब क़ाबू से बाहर होता जा रहा है और दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला यह देश कोरोना मरीज़ों का 4 लाख का आंकड़ा पार करके चौथा सबसे अधिक प्रभावित देश बन गया है।

भारत में कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड-19 वैश्विक महामारी से निपटने में मोदी सरकार ने कुछ बहुत ही फ़ाश ग़लतियां की हैं, जिसका ख़मियाज़ा अब जनता को भुगतना पड़ रहा है।

देश में अचनाक कड़े लॉकडाउन का एलान करके सरकार ने 76 दिनों के लॉकडाउन को ख़त्म करने का एलान ऐसे वक़्त में किया, जब संक्रमण के मामले बहुत तेज़ी से बढ़ रहे थे।

भारत में अब मंदिरों, मस्जिदों, होटलों और रेस्टोरैंटों को फिर से खोल दिया गया है, यहां तक कि सामूहिक धार्मिक यात्राएं भी निकाली जा रही हैं।


महामारी से निपटने की मोदी सरकार की नीतियों ने देश को भयावह स्वास्थ्य संकट में धकेल दिया है।

संक्रमण के नए मामले पहले से कहीं अधिक तेज़ दर से बढ़ रहे हैं, अस्पतालों में ख़ाली बेड और वेंटिलेटर नहीं हैं, टेस्ट आबादी के अनुपात से बहुत कम हो रहे हैं और वायरस नए इलाक़ों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में फैल रहा है।

जहां तक अर्थव्यवस्था की बात है, लॉकडाउन के कारण होने वाले नुक़सान के कारण, भारतीय रिज़र्व बैंक का अनुमान है कि इस वर्ष अर्थव्यवस्था में नकारात्मक वृद्धि होने वाली है। आर्थिक संकट से बचने की कोशिश के तहत प्रतिबंधों को हटाया जा रहा रहा है, दूसरी ओर महामारी एक भयानक आपदा का रूप लेती जा रही है।

देश को दो प्रमुख बड़े शहरों, राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई में पहले ही इस महामारी ने भंयकर रूप धारण कर लिया है, जहां पूरे देश की तुलना में कोरोना के एक तिहाई मामले सामने आ चुके हैं।

अस्पताल पहले से ही भरे पड़े हैं और गंभीर अवस्था वाले मरीज़ों को भी लौटाया जा रहा है। इसी महीने दिल्ली के उपनगरीय इलाक़े नोएडा में एक आठ महीने की गर्भवती महिला की एंबुलेंस में ही मौत हो गई, क्योंकि 13 घंटों की भागदौड़ के बाद 6 अस्पतालों ने उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया था।

दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीश सिसोदिया का कहना है कि जून के आख़िर तक राष्ट्रीय राजधानी में कोरोना के साढ़े पांच लाख केस होंगे, तो वहीं पूरे देश में यह संख्या 10 लाख को पार कर जाएगी।

स्थिति बहुत चिंताजनक है और दिन ब दिन हालात ख़राब हो रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों के लिए यह कोई हैरानी वाली बात नहीं है।

उनका मानना है कि महामारी ने वास्तविक स्थिति से पर्दा उठा दिया है। देश का हेल्थ सिस्टम बहुत ख़राब है। सरकार जीडीपी का केवल 1.3 प्रतिशत ही हेल्थ केयर पर ख़र्च करती है, जिसका मतलब है कि एक सामान्य महामारी भी देश में अराजकता पैदा कर सकती है।