इस प्रस्ताव के पारित होने की वजह जानने के लिए यह देखना होगा कि इन आठ बरसों में क्या बातें हुई हैं जिनके कारण आईएईए में यह प्रस्ताव पास हुआ है। इस सिलसिले में सबसे पहली घटना, वाइट हाउस में डोनल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में दक्षिण पंथियों के पहुंचने की है जिसके बाद अमरीका परमाणु समझौते से निकल गया। अमरीका के इन दक्षिण पंथियों के, ज़ायोनी दक्षिण पंथियों से बड़े क़रीबी रिश्ते हैं। इस तरह यह दक्षिणी पंथी अमरीकी धड़ा मध्यपूर्व में ज़ायोनी शासन की नीतियों को लागू करने की मशीन में बदल गया है।
हालांकि इस्लामी गणतंत्र ईरान, परमाणु समझौते से अमरीका के निकलते ही जैसे को तैसा की नीति पर अमल करते हुए शुरू में ही इस अंतर्राष्ट्रीय समझौते से निकल सकता था लेकिन उसने रणनैतिक संयम की नीति से काम लेते हुए इस समझौते के बाक़ी बचे सदस्यों के साथ मिल कर इसे बचाने की हर संभव कोशिश की। अलबत्ता जब उसने यह देखा कि परमाणु समझौते के यूरोपीय सदस्य, अपने वादों को पूरा नहीं कर रहे हैं तो उसने मजबूरन अपनी कटिबद्धताओं को धीरे धीरे कम करने की नीति अपनाई ताकि समझौते से निकले बिना ही उन्हें अपने वादों को पूरा करने पर बाध्य करे लेकिन इसके विपरीत उन्होंने ईरान की प्रतिक्रिया के संदेश को समझने और अपने वादों को पूरा करने के बजाए चाहे अनचाहे में ठीक उन्हीं लोगों की तरह काम किया जो परमाणु समझौते व अन्य अंतर्राष्ट्रीय समझौतों व संधियों से निकल गए हैं या ज़ायोनी व सऊदी माफ़िया की तरह अपने राजनैतिक व आर्थिक प्रभाव का इस्तेमाल करके अमरीकी दक्षिण पंथियों को इसके लिए उकसा रहे हैं।
इस बीच जो चीज़ आश्चर्य बल्कि खेद का कारण है वह यह है कि जर्मनी व फ़्रान्स जैसे देश, ऐसी स्थिति में इन कोशिशों का साथ दे रहे हैं जब वे स्वयं ही वाइट हाउस में सत्तासीन धड़े की हर समझौते पर पुनर्विचार की नीति का शिकार बने हुए हैं और इस धड़े ने ब्रेग्ज़िट का जो समर्थन किया उसके चलते यूरोपीय संघ विघटन के मुहाने तक पहुंच गया था। इस लिए यह सवाल सामने आता है कि क्या इन देशों ने अपेक्षाकृत प्रतिरोध की अपनी नीति को छोड़ दिया है और वाइट हाउस और सऊदी अरब व ज़ायोनी शासन जैसे उसके क्षेत्रीय पिट्ठुओं के दबाव के सामने घुटने टेक दिए हैं? या फिर वे परमाणु समझौते को बाक़ी रखना चाहते हैं और इसके लिए समय चाहते हैं और नहीं चाहते कि ईरान, उनके क़दम पर जवाबी कार्यवाही करे?
जहां तक आईएईए के निदेशक मंडल में आठ साल के बाद ईरान के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित होने की बात है तो इसके लिए दो अहम परिवर्तनों पर ध्यान देना होगा। पहला परिवर्तन, आईएईए के महानिदेशक का है और दूसरा संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव का है। यूकिया अमानो की अप्रत्याशित और संदिग्ध मौत के बाद रफ़ाइल गरूसी को आईएईए के नया महानिदेशक बनाया गया है जिन्हें अमरीका व ज़ायोनी शासन का समर्थन हासिल है। जब अलबरादेई के बाद अमानो आईएईए के चीफ़ बने थे तो यह चिंता पाई जाती थी कि वे अमरीका व इस्राईली माफ़िया के दबाव के सामने घुटने टेक सकते हैं लेकिन ऐसा कोई चिन्ह दिखाई नहीं दिया कि उन्होंने घुटने टेके हों। अमानो ने अपनी सभी रिपोर्टों में इस बात की पुष्टि की कि ईरान परमाणु समझौते के संबंध में अपने सभी वादों का पालन कर रहा है। यहां तक कि ईरान के परमाणु दस्तावेज़ों की चोरी के इस्राईल के दावे के बाद भी उनकी रिपोर्टों में कोई बदलाव नहीं आया जिससे ज़ायोनी शासन काफ़ी नाराज़ भी हुआ और ठीक यही समय था जब अमानो की संदिग्ध मौत की घोषणा की गई।
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव अंटोनियो गुटेरस के परिवर्तन के बारे में भी यह अपेक्षा थी कि यूरोप से चुने गए नए महासचिव के नेतृत्व में राष्ट्र संघ बान की मून की कंज़रवेटिव नीतियों से दूर हो जाएगा और अपने घोषणापत्र में वर्णित लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ेगा लेकिन खेद की बात कि ऐसा नहीं हो सका और गुटेरस के काल में किए गए कुछ फ़ैसलों ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया, जैसे कि उन्होंने यमन युद्ध में बच्चों के अधिकारों का हनन करने वालों की सूचि से सऊदी अरब का नाम बाहर निकाल दिया या फिर हाल ही में उन्होंने सऊदी अरब की आरामको आयल रिफ़ाइनरी पर मीज़ाइल हमले में ईरान पर इल्ज़ाम लगाया है जबकि यमनी बल इसकी ज़िम्मेदारी ले चुके हैं। उनके इन फ़ैसलों से सिद्ध हो गया कि वे भी सऊदी अरब के पेट्रो डाॅलरों या अमरीकी व ज़ायोनी माफ़िया के राजनैतिक दबाव से दूरी नहीं बना पाए।
जहां तक ईरान की बात है तो भविष्य में उसकी ओर से दो विकल्प संभावित हैं। एक तो यह कि वह रणनैतिक संयम की नीति जारी रहे और इसके अंतर्गत कम से कम उस समय तक माहौल को अधिक बिगड़ने न दे जब तक अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव के परिणाम सामने नहीं आ जाते। दूसरे यह कि वह खेल का मैदान पूरी तरह से बदल दे और इस बात के मद्देनज़र कि जिस नए हमले की तैयारी हो रही है वह सिर्फ़ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि मित्र व घटक भी उसकी चपेट में आएंगे और पूरे क्षेत्र में बदलाव आ सकता है, इस लिए खेल के नियम भी पूरी तरह से बदल जाएंगे।