वह ईश्वरीय मूल्यों के प्रति गहरी आस्था रखते थे। इसी कारण उनके जीवन का ध्यान योग्य भाग क्रांति के लिए होने वाले संघर्ष में बिता। 15 ख़ुर्दाद सन 1342 अर्थात 6 जून 1963 को होने वाली घटना ईरान के राजनीतिक परिवर्तन के इतिहास में महत्वपूर्ण घटना थी और ईरान की इस्लामी क्रांति में उसकी प्रभावी भूमिका है। वास्तव में 15 ख़ुर्दाद को जो क्रांतिकारी घटना हुई उसकी भूमिका उसी वर्ष से आरंभ हो गयी थी जब 28 मुर्दाद 1332 अर्थात अगस्त 1953 को अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान में विद्रोह करवाया था। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने अपने भाषणों और विज्ञप्तियों में शाह द्वारा किये जा रहे अत्याचारों को उसी वक्त से बयान करना आरंभ कर दिया था जब उसके अत्याचार अपनी चरम पर थे। इसी संबंध में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने अपना एतिहासिक भाषण ईरान के पवित्र नगर क़ुम के धार्मिक शिक्षा केन्द्र मदरसये फैज़िया में 13 खुर्दाद 1342 को दिया था जो 15 खुर्दाद के आंदोलन के आरंभ होने की भूमिका बना। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने मदरसये फैज़िया में जो एतिहासिक भाषण दिया था वास्तव में उसमें अत्याचारी शाह की सरकार द्वारा ईरानी राष्ट्र पर किये जा रहे अत्याचारों का पर्दा फाश किया गया था। इसी प्रकार उस एतिहासिक भाषण ने शाही सरकार के चेहरे से मुखौटा हटा दिया था जो साम्राज्यवादी सरकारों के इशारों पर चल और उनके हितों के लिए काम कर रही थी। शाही सरकार के मुखौटे से पर्दा हटा देने वाले स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के भाषण के बाद 15 खुर्दाद 1342 की सुबह को शाह के सुरक्षा कर्मियों ने पवित्र नगर कुम में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के घर पर हमला कर दिया और उन्हें गिरफ्तार करके तेहरान के एक जेल में स्थानांतरित कर दिया। यह खबर जंगल की आग की तरह ईरान में फैल गयी और कुम, तेहरान, मशहद और शीराज़ सहित विभिन्न नगरों में लोग सड़कों पर निकल आये और बड़े पैमाने पर प्रदर्शन आरंभ हो गये यहां तक कि ये प्रदर्शन कई दिनों तक जारी रहे और उसके दौरान शाह के सुरक्षा कर्मियों ने बहुत से ईरानी प्रदर्शनकारियों को शहीद और घायल कर दिया।
यद्यपि शाह के सुरक्षा कर्मियों ने कुछ समय के बाद स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी को स्वतंत्र कर दिया परंतु शाह की तानाशाही सरकार के खिलाफ आपत्ति और प्रदर्शन जारी रहे और स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने न केवल मौन धारण नहीं किया बल्कि अधिक साहस के साथ शाह की अत्याचारी सरकार के क्रियाकलापों को बयान करना आरंभ कर दिया और उनकी आपत्ति के जारी रहने के कारण शाह के सुरक्षा कर्मियों ने स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी को दोबारा गिरफ्तार कर लिया और 15 वर्षों तक उन्हें देश निकाला दे दिया। शाह ने सबसे पहले स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी को तुर्की, उसके बाद इराक के पवित्र नगर नजफ और अंत में फ्रांस की राजधानी पेरिस देश निकाला दे दिया।
संगीत
स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने 15 खुर्दाद 1342 के बारे में कहा था कि 15 खुर्दाद इस्लाम और मुसलमानों का पुनर्जन्म है। ज्ञात रहे कि 15 खुर्दाद 1342 को आशूर का भी दिन था और पूरा ईरानी राष्ट्र इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत का शोक मना रहा था। 15 खुर्दाद का दिन ईरान के राजनीतिक परिवर्तनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है। 15 खुर्दाद को आरंभ होने वाले आंदोलन ने शाह की अत्याचारी सरकार का अंत कर दिया। 15 खुर्दाद को शहीद होने वाले लोगों के खून ने पश्चिम की साम्रराज्यवादी सरकारों के इशारे पर काम करने वाली तानाशाही सरकार के स्तंभों को हिला दिया और ईरानी राष्ट्र ने अपने प्रियजनों की कुर्बानी देकर अपनी भावी पीढ़ियों के लिए प्रतिरोध व आंदोलन का मार्ग खोल दिया और ईरानी राष्ट्र ने महान ईश्वर पर भरोसा करके असंभव को संभव बना दिया।
स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने अत्याचारग्रस्त व मज़लूम राष्ट्रों में यह भावना उत्पन्न कर दी कि कठिन से कठिन स्थिति में भी बड़ी से बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है और प्रतिरोध व संघर्ष से यह दर्शा दिया कि वास्तविक सत्ता जनता के पास है और दुनिया की बड़ी शक्तियों पर भरोसा किये बिना बड़ी से बड़ी राजनीतिक और ग़ैर राजनीतिक उपलब्धि अर्जित की जा सकती है। इस आधार पर ईरान की इस्लामी क्रांति दुनिया के स्वतंत्रता प्रेमी राष्ट्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गयी और अत्याचार से पीड़ित दुनिया के बहुत से राष्ट्र ईरान की इस्लामी क्रांति को आदर्श के रूप में देखते हैं और इस क्रांति को सफल हुए चार दशकों का समय बीत चुका है और आज भी दुनिया के बहुत से राष्ट्र व लोग इस क्रांति को प्रेरणा के स्रोत के रूप में देख रहे हैं। लेबनान और फिलिस्तीन में होने वाले प्रतिरोधों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के विचारों ने दर्शा दिया है कि इस्लामी क्रांति दुनिया में न्याय चाहती है। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने लोगों को जागरुक बनाकर दुनिया के कमज़ोर इंसानों के अंदर प्रतिरोध की भावना उत्पन्न कर दी है। आज ईरान से विश्व साम्राज्य की दुश्मनी की एक वजह यह है कि ईरान के अलावा दूसरे राष्ट्र भी वर्चस्वादियों के खिलाफ खड़े होते जा रहे हैं। दूसरे शब्दों में जिस तरह से वर्चस्ववादियों के खिलाफ लोग व राष्ट्र खड़े होते जा रहे हैं उससे उनके वर्चस्व का दायरा कम होता जा रहा है। यही नहीं ईरानी राष्ट्र के साहस को देखकर दूसरे राष्ट्र भी वर्चस्वादियों के सामने नतमस्तक होने के लिए तैयार नहीं है। वेनेज़ोएला में होने वाले हालिया परिवर्तनों को इसी दिशा में देखा जा सकता है।
इस वास्तविकता से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के क्रांतिकारी विचार पूरी दुनिया में फैलते और प्रेरणा का स्रोत बनते जा रहे हैं जबकि अमेरिका गत चार दशकों से ईरान की इस्लामी व्यवस्था को खत्म करने के लिए किसी प्रकार के प्रयास में संकोच से काम नहीं ले रहा है। कुछ प्रतिबंधों को अमेरिका ने चार दशकों से ईरान पर लगा रखा है और अब उसने ईरान पर अधिक से अधिक दबाव की नीति अपना रखी है परंतु अतीत की भांति अब भी उसे मुंह की खानी पड़ रही है और विभिन्न प्रकार के प्रतिबंधों के बावजूद ईरान विभिन्न क्षेत्रों में ध्यान योग्य प्रगति कर रहा है। ईरान के खिलाफ जो अमेरिकी प्रतिबंध हैं उनका एक लक्ष्य ईरान को प्रगति करने से रोकना है परंतु ईरानी राष्ट्र महान ईश्वर की मदद और अपनी आंतरिक संभावनाओं पर भरोसा करके प्रयास कर रहा है और उसके इसी प्रयास का नतीजा है कि आज उसने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कर ली है और ईरानी राष्ट्र ने अपने प्रयासों से यह सिद्ध कर दिया है कि वह असंभव प्रतीत होने वाले कार्यों को संभव बना सकता है और जो लोग यह सोचते थे कि अमेरिका का विरोध करके ज़िन्दगी नहीं की गुज़ारी जा सकती तो ईरान ने इस विचार को भी ग़लत सिद्ध कर दिया है और विश्ववासियों को यह दिखा दिया है कि क्रांतिकारी और प्रतिरोधक भावना का न तो मुकाबला किया जा सकता है और न ही उसे झुकाया जा सकता है। बहुत से लोगों व जानकार हल्कों का मानना है कि ईरान की प्रगति का एक राज़ स्वयं दुश्मनों विशेषकर अमेरिकी प्रतिबंध हैं और अगर ये प्रतिबंध और दबाव न होते तो ईरान इतनी प्रगति न करता।
इसी प्रकार कुछ दूसरे जानकार हल्कों का मानना है कि वर्चस्वादी शक्तियों विशेषकर अमेरिका की यह समझ में नहीं आ रहा है कि वह ईरानी राष्ट्र का मुकाबला कैसे करें इसलिए ईरान पर प्रतिबंध लगाने के अलावा अमेरिका के पास कोई विकल्प नहीं बचा है और अमेरिका और विश्व के दूसरे राष्ट्र इस बात को देख रहे हैं कि प्रतिबंधों से भी ईरान को प्रगति करने से नहीं रोका जा सकता।
रोचक बात यह है कि एक वह समय था जब अमेरिकी बड़े घमंड से कहते थे कि ईरान के खिलाफ समस्त विकल्प मेज़ पर हैं पर अब कोई अमेरिकी यह बात नहीं कहता। क्योंकि अमेरिका को हर दूसरे देश व शासन से अधिक ईरान की क्षमता का बहुत अच्छी तरह अंदाज़ा हो गया है और इसलिए वह ईरान से टकराने से डरता व कतराता है। क्योंकि उसे अच्छी तरह पता है कि अगर ईरान से टकरायेगा तो उसने अपनी झूठी व खोखली शक्ति का जो भ्रम फैला रखा है और क्षेत्रीय देशों को ईरान से डराकर हथियार बेचता है उसकी समस्त पाखंडी चालों पर पानी फिर जायेगा और पूरी दुनिया उसकी ताक़त की वास्तविकता को अपनी आंखों से देख लेगी।
ईरान ने अभी पिछली जनवरी में इराक में अमेरिका की सैनिक छावनी एनुल असद पर मिसाइलों से जवाबी हमला करके वाशिंग्टन को अपनी सैन्य क्षमता से अवगत करा दिया था। इस हमले के कई घंटे के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि ईरान के मिसाइल हमले में कुछ भी नहीं हुआ है सब ठीक ठाक है। उनका एक सैनिक भी घायल नहीं हुआ है जबकि कुछ ही दिनों के बाद अमेरिकी रक्षामंत्रालय पेंटागन ने स्वीकार किया कि ईरान के इस हमले में कुछ अमेरिकी सैनिक घायल हुए हैं और उनके दिमाग़ में हल्की चींटें आयी हैं। पेंटागन ने कुछ दिनों के भीतर कम से कम तीन बार इराक की एनुल असद छावनी में घायल होने वाले सैनिकों की संख्या अलग- अलग बतायी और यह भी कहा था कि इस संख्या में वृद्धि हो सकती है।
अमेरिका ने जब जनवरी महीने में अपने आतंकवादी ड्रोन हमले में जनरल क़ासिम सुलैमानी को बगदाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बाहर शहीद कर दिया था तब ईरान ने जवाबी कार्यवाही की धमकी दी थी पर अमेरिका ने कहा था कि अगर ईरान ने कुछ किया तो 52 ठिकाने उसके निशाने पर हैं किन्तु ईरान ने अमेरिका की गीदड़ भपकियों पर कोई ध्यान नहीं दिया और आधुनिकतम हथियारों से लैस इराक में उसकी एनुल असद छावनी को मिट्टी के ढेर में बदल दिया और उसके बाद अमेरिका अपनी सारी धमकियों को भूल गया। उसकी सबसे मुख्य वजह यह थी कि अमेरिका को ईरान से टकराने के परिणाम सामने नज़र आने लगे थे।
बहरहाल ईरानी राष्ट्र स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के दिशा निर्देशों पर अमल कर रहा है और विश्व की किसी भी वर्चस्वादी शक्ति से भयभीत हुए बिना अदम्य साहस के साथ प्रतिरोध कर रहा है जो देश व शक्तियां ईरान को झुकाने का स्वप्न देख रही हैं वास्तव में उन्होंने सही से अतीत से पाठ नहीं लिया है।