2 जून 2020 - 19:05
इमाम ख़ुमैनी रह. की वफ़ात पर विशेष कार्यक्रम

चार ख़ुर्दाद 1368 अर्थात चार जून 1989 को ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के निधन की ख़बर दी गयी जिससे न केवल पूरा ईरान और इस्लामी जगत बल्कि दुनिया के स्वतंत्रप्रेमी राष्ट्र और लोग भी शोकाकुल हो गये।

जैसे ही स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के निधन का समाचार आया लोग सड़कों पर निकल आये और चारों तरफ शोक की लहर दौड़ गयी। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के दफ्न समारोह में लोगों की अपार संख्या ने भाग लिया जिससे इस बात को भली-भांति समझा जा सकता है कि स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी से लोग कितना प्रेम करते थे। बहुत अधिक लोगों की उपस्थिति इस बात का कारण बनी कि कि वर्तमान शताब्दी में किसी के भी दफ्न समारोह में इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने भाग नहीं लिया। इसी प्रकार स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी जब 15 वर्षों तक निश्कासन का जीवन बिताने के बाद पेरिस से स्वदेश आये थे तो उस वक्त भी ईरानी जनता ने ऐसा स्वागत किया था जो अब तक बेमिसाल है।

ईरान की इस्लामी व्यवस्था के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के दफ्न समारोह की ख़बर और उस पर प्रतिक्रिया का कवरेज दुनिया के विभिन्न चैनलों, संचार माध्यमों और अखबारों ने दी थी। इस प्रकार से कि काफी समय समय तक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी से संबंधित ख़बरें सुर्खियों में होती थीं। उस समय समाचार एजेन्सी फ्रांस प्रेस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी को दफ्न हुए एक दिन का समय गुज़र चुका है फिर भी हज़ारों लोग बहिश्ते ज़हरा क़ब्रिस्तान में उनकी मज़ार के पास जमा हैं, दुआ पढ़ रहे हैं और मातम कर रहे हैं और सबको इस बात का पक्का विश्वास है कि जिस जगह पर उन्हें दफ्न किया गया है वह दुनिया के लोकप्रिय स्थान में परिवर्तित हो जायेगा।

एक अमेरिकी समाचार पत्र “इंटरनेश्नल हेराल्ड ट्रिब्यून” अपने एक संस्करण में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के बारे में लिखता हैः "आयतुल्लाह ख़ुमैनी कभी भी न थकने वाले एक क्रांतिकारी थे और वे अपने जीवन की अंतिम सांस तक ईरान में इस्लामी समाज और सरकार के प्रति वफ़ादार रहे। इसी प्रकार समाचार पत्र हेराल्ड लिखता है। "आयतुल्लाह ख़ुमैनी जो अपनी प्राचीन भूमि के लिए चाहते थे एक क्षण के लिए भी उससे निश्चेत नहीं हुए और वह ईरानी समाज को हर उस चीज़ से पवित्र करना चाहते थे जिससे पश्चिम दूषित है और उन्होंने ईरानी राष्ट्र की इस्लामी पहचान वापस कर दी।"  

इस्लामी व्यवस्था के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी को ईरानी जनता का अद्वितीय समर्थन प्राप्त था और इसी समर्थन का परिणाम था जो उनके नेतृत्व में 11 फरवरी वर्ष 1979 को ईरान की इस्लामी क्रांति सफल हो गयी और उसने पूर्बी और पश्चिमी ब्लाकों के समीकरण को उलट कर रख दिया। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इस्लाम के राजनीतिक विचारों को दोबारा ज़िन्दा करना चाहते थे।

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी जिस इस्लामी क्रांति का नेतृत्व कर रहे थे उसमें और  हालिया शताब्दियों के दौरान विश्व में आने वाली क्रांतियों में एक मूल अंतर यह है कि इस क्रांति ने विशुद्ध इस्लाम की शक्ति की मात्र एक झलक पेश की है। जिस दुनिया में इंसान को केन्द्र बिन्दु मान कर बहुत कुछ किया जा रहा है, अध्यात्म को उपासना स्थलों तक सीमित कर दिया गया था और लोगों के जीवन में उसकी कोई भूमिका नहीं थी स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने ईश्वरीय दूतों की तरह जीवन व्यतीत करके असंख्य लोगों के दिलों में चेतना की लहर दौड़ा दी। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी बहुत बड़े विद्वान, धर्मगुरू, धर्मशास्त्री, रहस्यवादी और दर्शनशास्त्री थे। उन्होंने अपने सादा जीवन से लोगों के भौतिक जीवन को अध्यात्मिक जीवन से जोड़ दिया था। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी का जो अभियान था उसका स्रोत इंसान की मूल प्रवृत्ति थी और यह प्रवृत्ति केवल भौतिक चीज़ों से तृप्त व समृद्ध नहीं हो सकती बल्कि अध्यात्म नाम की एक लापता चीज़ है जिससे स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने लोगों को परिचित कराया और विश्व वासियों को बता दिया कि इस्लाम ईश्वरीय धर्म है और इस ईश्वरीय धर्म ने इंसान के जीवन के समस्त आयामों पर ध्यान दिया है।

इसी प्रकार स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने लोगों को अध्यात्म और अध्यात्मिक शक्ति से परिचित करा दिया और यह भी बता दिया कि अध्यात्म मस्जिदों और उपासना स्थलों तक सीमित नहीं है और जब वह इंसान के जीवन में आ जाता है तो इंसान के जीवन को उद्देश्यपूर्ण बना देता है। लोग जब स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी का भाषण सुनते थे तो ऐसा लगता था मानो वे अपनी आत्मा व शुद्ध प्रवृत्ति की आवाज़ सुन रहे हैं और स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी उनसे कह रहे हैं कि अपनी मूल प्रवृत्ति की ओर वापस लौट आओ और अत्याचार, बुराई और भेदभाव को स्वीकार न करो और आसमानी धर्म को पुनर्जीवित करने के लिए उठ खड़े हो।

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ठीक समय पर राजनीतिक दृष्टिकोण अपना कर भाषण देते और विज्ञप्ति जारी करते थे जिससे पता चलता था कि वह बहुत ही समझदार, विवेकशील और दूरदृष्टि रखने वाले नेता हैं। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी समय की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति के साथ-साथ लोगों की भावनाओं और ज़रूरतों से भी अच्छी तरह अवगत थे इसी कारण उन्होंने लोगों के मध्य भारी परिवर्तन उत्पन्न कर दिया था। इस प्रकार कि उन्होंने ईरानी जनता में नया प्राण फूंक दिया था।

आस्ट्रियाई प्रोफेसर लेन्सर, इमाम ख़ुमैनी के बारे में कहतां हैं। ”इंसान को महान ईश्वर से निकट करने का उन्होंने नया द्वार खोला और लोगों के समर्थन से 20वीं शताब्दी की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना इस्लामी क्रांति को सफल बनाया।"

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने जो आंदोलन किया उसका उद्देश्य शाह द्वारा ईरानी राष्ट्र पर किये जा रहे अत्याचारों को खत्म करना और इस्लामी शिक्षाओं को दोबारा ज़िन्दा किये जाने के अलावा कुछ और नहीं था। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी अपने व्यक्तिगत जीवन में भी इस्लाम की शिक्षाओं का पूर्ण पालन करते थे। जैसे वह बहुत सादा जीवन व्यतीत करते और सांसारिक चमक- दमक से बहुत दूर रहते थे। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी अपने जीवन में ज़रूरत से अधिक वस्तुओं का प्रयोग नहीं करते थे जबकि ईरान की इस्लामी क्रांति सफल हो गयी थी और हर चीज़ तक उनकी पहुंच थी परंतु इन सबके बावजूद वह बहुत ही सादा जीवन व्यतीत करते थे। उनका रहन- सहन, मकान, वस्त्र और खाना आदि सब चीज़ें सामान्य लोगों से भी साधारण थीं और वे कम से कम पर प्रसन्न व संतुष्ट रहने पर बहुत बल देते थे। यहां पर कोई यह सोच व कह सकता है कि वह दुनिया से अलग -थलग इंसान थे और दुनिया में क्या हो रहा है उनसे कोई मतलब नहीं था? तो इसके जवाब में कहना चाहिये कि कदापि ऐसा नहीं है। वह दुनिया और लोगों से कटकर अलग रहने वाले इंसान नहीं थे। उन्हें हमेशा अपने और दूसरे समाजों की जानकारी रहती थी। वह सदैव ग़रीबों और वंचितों की भलाई के बारे में सोचते और स्वयं को उनके प्रति ज़िम्मेदार समझते थे।

जब स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी फ्रांस की राजधानी पेरिस के निकट नोफेल लोशातो क्षेत्र में रह रहे थे तो उस वक्त उनके सादा जीवन के बारे में एक फ्रांसीसी प्रोफेसर मोन्ते कहता है” हर चीज़ से अधिक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के जीवन की सादगी ने मुझे अपनी ओर आकर्षित किया। वे पेरिस में एक छोटे से मकान में रहते थे जिसमें केवल दो कमरे थे। एक सोने का कमरा था और दूसरे में वह काम करते और लोगों से मुलाकात करते थे और उनके जीवन में कोई क़ीमती चीज़ नहीं दिखाई पड़ी। इमाम ख़ुमैनी एक महान धर्मगुरू, धर्मशास्त्री, विद्वान और दर्शनशास्त्री थे और वे लोगों के दिलों पर राज करते थे। वह सदाचारी नेता थे। उनके सादा जीवन के बारे में उनके उत्तराधिकारी और ईरान की इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं। "मार्गदर्शक और सदाचारी एक साथ होना उन कार्यों में से है जिसे हज़रत दाऊद, हज़रत सुलैमान और पैग़म्बरे इस्लाम जैसी हस्तियों के अलावा किसी दूसरे इंसान में नहीं देखा जा सकता।“

वास्तव में इस प्रकार का इंसान इस्लामी और कुरआनी शिक्षाओं का एक छोटा सा प्रतिफल है। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने ईरान में जिस इस्लामी व्यवस्था की स्थापना की उसका उद्देश्य लोगों का सही प्रशिक्षण था। जो इंसान इस्लाम और पवित्र कुरआन की शिक्षाओं की छत्रछाया में पले- बढ़ेगा वह अत्याचार विरोधी होगा, लोगों से प्रेम करने वाला होगा, महान ईश्वर पर भरोसा करने वाला होगा। उसी से मदद मांगेगा। ईरान की इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई स्वयं स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के एक शिष्य हैं। वह स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की इस विशेषता के बारे में कहते हैं। "स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी एक शासक और राजनेता के रूप में एक विवेकशील, होशियार और दूरगामी सोच रखने वाली हस्ती थे और कोई भी घटना उन्हें विचलित न कर सकी और कोई भी चीज़ उन्हें झुकने पर मजबूर न कर सकी। उनके 10 वर्षीय नेतृत्व के काल में जितनी भी कठिन से कठिन घटनायें घटीं इमाम उन सबसे बड़े थे। इराक़ द्वारा ईरान पर थोपा गया आठ वर्षीय युद्ध, अमेरिकी हमला, विद्रोह का षड्यंत्र, विचित्र आतंकवादी हत्याएं, आर्थिक परिवेष्टन और विभिन्न प्रकार से दुश्मनों की ओर से की जाने वाली साज़िशें कभी भी स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी को विचलित न कर सकीं। वह इन समस्त घटनाओं से अधिक मज़बूत और शक्तिशाली थे।

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी लोगों से बहुत प्रेम करते थे और लोग भी उनसे बहुत प्रेम करते थे। लोगों की राय, उनका चयन और उनकी पसंद स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के निकट बहुत महत्व रखती थी। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी लोगों से बहुत विनम्रता से पेश आते थे और स्वयं को हमेशा जनता और लोगों का सेवक कहते थे। वह जनता की सेवा और उसकी प्रतिष्ठा की सुरक्षा के बारे में ज़िम्मेदारों को संबोधित करते हुए बल देकर कहते थेः "अगर लोग एक सेवा करने वाले ज़िम्मेदार को नहीं चाहते हैं तो उसे हट जाना चाहिये। इसी प्रकार स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ज़िम्मेदारों और अधिकारियों से बल देकर कहते थे कि लोगों का ध्यान रखें और कभी भी उनकी अनदेखी न करें।"

वह कहते थेः ”इन अत्याचारग्रस्त और पीड़ित लोगों की सेवा कीजिये। जिन लोगों ने आपको यहां तक पहुंचाया है जिससे जितना हो सकता है वह उनकी उतनी सेवा करे।" इसी प्रकार स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी दूसरे राष्ट्रों को भी अत्याचार और अत्याचारियों से मुक्ति दिलाने के बारे में सोचते थे। वह एक स्थान पर कहते हैं। "आशा है कि यह क्रांति महामुक्तिदाता हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़ुहूर व प्रकट होने की भूमिका बनेगी। आशा है कि इस क्रांति का प्रसार पूरी दुनिया में वंचितों और कमज़ोरों को मुक्ति दिलाने के लिए होगा और जिस रास्ते पर आप चल रहे हैं उसी रास्ते पर दुनिया के वंचित लोग भी चलेंगे और इस्लाम के दुश्मनों और अहंकारियों पर विजय हासिल कर लेंगे।"