क्षेत्र में अमरीका और उसके सहयोगियों के ख़िलाफ़ कई बार दुनिया ईरानी हथियारों की धार देख चुकी है, यही वजह है कि कई देश ईरान से हथियार और सैन्य उपकरण ख़रीदने में गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
हालांकि ट्रम्प प्रशासन ने धमकी दी है कि वह हर क़ीमत पर ईरान के ख़िलाफ़ राष्ट्र संघ के हथियारों के प्रतिबंध को आगे बढ़वा कर रहेगा।
अमरीका हाथ पैर तो ख़ूब मार रहा है, लेकिन अपने इन प्रयासों में वह अलग-थलग पड़ता जा रहा है, इसलिए कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार रखने वाले उसके पारम्परिक सहयोगी यरोपीय देशों ने विपरीत दिशा में देखना शुरू कर दिया है।
इसके अलावा, रूस और चीन ने भी यूरोपीय देशों और अमरीका को यह संदेश दे दिया है कि वह ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों के प्रतिबंधों के हर प्रस्ताव को वीटो कर देंगे।
ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी पहले ही कड़ी चेतावनी दे चुके हैं कि अगर ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों के प्रतिबंध को आगे बढ़ाया गया तो तेहरान की प्रतिक्रिया बहुत सख़्त होगी।
ईरान जहां अपनी ज़रूरत के हथियार रूस, चीन और यूरोपीय देशों से ख़रीद सकता है, वहीं क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देश ऐसे हैं, जो पहले ही ईरानी हथियार ख़रीदने में दिलचस्पी दिखा चुके हैं, लेकिन प्रतिबंधों के कारण बात आगे नहीं बढ़ सकी।
मास्को में ईरानी राजदूत ने यह रहस्योद्घाटन किया है कि कई देशों ने ईरानी हथियार ख़रीदने के लिए ऑर्डर दिए हैं।
काज़िम जलाली का कहना था कि ईरान को रक्षा व सैन्य उपकरणों की आपूर्ति के ऑर्डर प्राप्त हुए हैं। नवम्बर में प्रतिबंधों के हटने के बाद, तेहरान इन ऑर्डर्स की समीक्षा करेगा।
सुरक्षा परिषद में वीटो के डर से अमरीका की कोशिश है कि वह किसी तरह यह साबित कर दे कि परमाणु समझौते में वह अभी भी एक भागीदार है, ताकि समझौते में शामिल उस विवादित तंत्र (mechanism) का इस्तेमाल कर सके, जिससे ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों को कोई वीटो नहीं कर सके।
ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने स्पष्ट शब्दों में अमरीका को बता दिया है कि वह एकपक्षीय रूप से परमाणु समझौते से निकल चुका है और अब इसका इस समझौते से कोई संबंध नहीं है।
यूरोपीय संघ ने भी ईरान के इस पक्ष का समर्थन किया है और एलान किया है कि अमरीका को यह हक़ हासिल नहीं है कि जब वह चाहे समझौते से निकलने का एलान कर दे और जब चाहे इस समझौते में शामिल होने का दावा करने लगे।