रिपोर्टों से पता चलता है कि अमरीकी अधिकारी ईरान के खिलाफ जवाबी कार्यवाही या फिर सीमित दंड पर असमंजस का शिकार हैं लेकिन एक तीसरी रणनीति भी है जिस पर पिछले दो साल से ट्रम्प सरकार के बहुत से लोग विचार कर रहे है। इस रणनीति के अंतर्गत ईरान को युद्ध आरंभ करने के लिए भड़काने का फैसला किया गया क्योंकि इस तरह से वाशिंग्टन के लिए खतरे कम हो जाएंगे। इसके लिए अमरीकियों ने सब से अच्छा तरीका यह निकाला है कि ईरान से तुर्की को विशेष कर उत्तरी मध्य पूर्व में भिड़ा दिया जाए। यह रणनीति तो बन गयी है लेकिन अमरीका में बहुत से लोग इसे अंसभव समझते हैं क्योंकि उनका कहना है कि भले ही अमरीका और तुर्की एक दूसरे के घटक हैं लेकिन आज कल दोनों देशों के मध्य राजनीतिक सहयोग बहुत कम है लेकिन सच्चाई यह है कि इन बारीकियों पर ध्यान दिये बिना ट्रम्प सरकार तुर्की के साथ अपने संबंधों को फिर से घनिष्ट करने की कोशिश कर रही है।
ईरान हमेशा ईरान है
मध्य पूर्व के बारे में ट्रम्प की नीतियों में ईरान पर अधिक ध्यान दिये जाने की सच्चाई ट्रम्प सरकार के विभिन्न बयानों में साफ झलकती है। सितम्बर सन 2018 में ट्रम्प के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने खुल कर कहा था कि जब तक ईरान और उसके सशस्त्र संगठन क्षेत्र में सक्रिय रहेंगे हम वहां से हटने वाले नहीं हैं।
यह हालात 2 जनवरी सन 2020 में बदल गये। जब ईरान की क्षेत्रीय नीतियों के जनक कहे जाने वाले जनरल कासिम सुलैमानी अमरीका के एक ड्रोन हमले में इराक के स्वंय सेवी बल के कमांडर के साथ मारे गये तो वाशिंग्टन और तेहरान में अपेक्षाएं बदल गयीं। इस हमले से यह स्पष्ट हो गया कि ट्रम्प ईरान को पीछे ढकेलने के लिए टकराव का फैसला भी कर सकते हैं।
एक घटक के लिए दूसरे घटक से हाथ धोने की नीति
ओबामा के काल में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यह ज़रूरी था कि अमरीका उन बलों से सहयोग कम करे जो ईरान के बढ़ते साम्राज्य को रोकने में रूचि नहीं रखते थे। इस लिए उस दौर में एक का हाथ छोड़ कर दूसरे घटक का हाथ पकड़ना मुख्य रणनीति रही।
तुर्की और ईरान पर ध्यान दिया जाए, न कि कुर्दों और दाइश पर
अमरीका के अंदर ट्रम्प के विरोधियों का कहना है कि अमरीका को कुर्दों और दाइश पर ध्यान देने के बजाए तुर्की के साथ सहयोग करना चाहिए था ताकि क्षेत्र में ईरान के बढ़ते प्रभाव पर अंकुश लगाया जा सके।
क्या तुर्की ईरान का मुकाबला कर सकता है?
जब ट्रम्प की सरकार में बड़ी जोश व उत्साह के साथ ईरान के खिलाफ तुर्की के साथ संयुक्त मोर्चा खोलने की रणनीति तैयार की जा रही थी तब भी यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं था कि क्या तुर्की में ईरान के बढ़ते प्रभाव के सामने टिकने का दम भी है या नहीं? हमें तो यह लगता है कि अर्दोगान के पास न तो ईरान के खिलाफ ज़रूरी सैन्य शक्ति है और न ही उन्हें ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को रोकने की रणनीति में कोई दिलचस्पी है।
तुर्की और अमरीका के संयुक्त मोर्चे में समस्या क्या है?
तुर्की से ज़बरदस्ती विवाद पैदा करने वाले अमरीका के लिए तुर्की के साथ अचानक ही सहयोग, अगर हुआ भी तो बहुत सीमित होगा। ईरान नाम के संयुक्त प्रतिस्पर्धी और दुश्मन की मौजूदगी के बावजूद तुर्की और अमरीका के मध्य पहले वाली दोस्ती की राह में कई बाधाएं हैं। इसके अलावा मूल रूप से ईरान के खिलाफ तुर्की को घटक अपनाने की रणनीति पर अमरीका में भी बहुत अधिक आपत्ति की जा रही है। ट्रम्प ने जल्दबाज़ी में कुर्दों को पूरी तरह से छोड़ दिया। पिछले एक साल के दौरान मध्य पूर्व में अन्य लाखों लोगों ने यह सिद्ध किया है कि वह सीरिया के कुर्दों की ही तरह अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं।
गलत अनुमान से मध्य पूर्व के हालात और खराब होंगे
अमरीकी सरकार में कुछ शक्तिशाली नेताओं के अनुसार ऐसा लगता है कि अब वह समय आ गया है कि जब हम तुर्की को ईरान के सामने खड़ा कर सकते हैं लेकिन हमारे ख्याल मे इस रणनीति पर काम अस्ल में इलाक़े में अमरीका की रणनैतिक गलती और बहुत बड़ी गलतफहमी होगी। मूल रूप से तुर्की के आधार पर ईरान के खिलाफ कोई भी नीति गलत होगी। ईरान का बढ़ता प्रभाव इलाक़े में अमरीकी हितों के लिए खतरा है लेकिन यह मध्य पूर्व में हमारी एक समस्या है। हमें यह जान लेना चाहिए कि मध्य पूर्व में हमारे सामने सुन्नी कट्टरपंथ की समस्या भी है। एक साम्राज्यवादी और गैर लोकतांत्रिक सरकार को, किसी अन्य देश से लड़ने के उद्देश्य से मज़बूत करने की नीति , अगल सफल तब भी, उससे मध्य पूर्व की समस्याओं में केवल वृद्धि ही होगी और इससे अमरीकी हितों को और अधिक नुक़सान पहुंचेगा। Q.A. साभार, War on the Rocks लेखक के विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं।